Thursday, June 9, 2011

किसकी है यह सरकार?


४ जून की घटना के कई मायने हैं. कुछ चीजें सामने आ गई हैं, कुछ परदे के पीछे हैं. यहाँ मैं कुछ छुए और कुछ बिलकुल अनछुए पहलुओं पर चर्चा करना चाहूँगा. जहाँ तक सरकार और उसके मंत्रियों का सवाल है, यह साफ़ दिख रहा है कि सत्तापक्ष में दो धड़े हो चुके हैं. एक धड़ा लोकतान्त्रिक मूल्यों और मानवातावादी मूल्यों का पोषक है, तो दूसरा सत्ता, शक्ति के नशे में चूर होकर मदमस्त, अँधा और तानाशाह बन चुका है. पहला धड़ा गांधीवादी, भारतीय सांस्कृतिक और सामाजिक मूल्यों का समर्थक है, तो दूसरा धड़ा पाश्चात्य सांस्कृतिक, सामाजिक, राजनैतिक विचारधारा का समर्थक ही नहीं बल्कि हर कीमत पर उसे भारत पर थोपने के लिए लालायित है. पर कुल मिलाकर संख्या में ज्यादा कौन है, यह कहना मुश्किल है. पर यह साफ़ हो चुका है कि तानाशाह धड़ा सरकार की नीतियों और महत्वपूर्ण निर्णयों पर जरूर भारी पड़ रहा है. उदारवादी धड़ा पता नहीं किस मजबूरी में हर गलत कदम को चुपचाप सहन कर रहा है. शायद सत्य का साथ देने की अपेक्षा सत्ता का साथ देना ज्यादा सुगम लग रहा है.

विरोध और विचारों पर चर्चा प्रजातंत्र को शक्ति प्रदान करने वाले प्रेरणा स्रोत हैं. चाहे वह सरकार को चलाने वाली पार्टी के अन्दर हो या विरोधी पक्ष की तरफ से हो. प्रश्न यह है की देश, उसके लोग, देश का भविष्य ज्यादा महत्वपूर्ण है या सरकार, सरकार में सम्मिलित दल, सरकार में सम्मिलित दलों के नेता और उनके निजी हित? सरकार के किसी भी कदम से अगर देश और देश के लोगों को नुक्सान होता है, तो विपक्ष ही नहीं बल्कि सत्ताधारी पार्टी की तरफ से भी सरकार के कदम की निंदा होनी चाहिए. सरकार में सम्मिलित दल के किसी नेता के किसी कर्म से अगर देश का अहित होता है तो वह सबके लिए सर्वथा निंदनीय होना चाहिए. अगर सरकार के आदेश पर पुलिस ने कुछ अमानवीय कृत्य किया है, तो उसकी निष्पक्ष जांच की मांग भी राजनेताओं को दल और विचारधारा के भेदभाव को परे रखकर करना चाहिए. पर दुर्भाग्य की बात है, एक भी सत्ताधारी दल के नेता ने पुलिस के कृत्य की निंदा नहीं की और ना ही अमानवीय कृत्यों के लिए दोषी पुलिस अधिकारियों का पता लगा कर कारवाई की मांग की. उल्टा कारवाई को सही ठहराया. ऐसा तो किसी तानाशाह ने भी नहीं किया होगा. क्योंकि शांतिपूर्ण अनशन करनेवाले लोग ना तो सत्ता परिवर्तन की बात कर रहे थे, ना ही स्वयं के लिए कुछ सरकार से सुविधा मांग रहे थे. वे तो सरकार से ऐसे कड़े कदम उठाने और कड़े क़ानून बनाने की मांग कर रहे थे जो देशहित में था और बहुत वर्षों पहले ही हो जाना चाहिए था.

अब चर्चा करें मीडिया की. मीडिया को निष्पक्ष, निडर और निष्कलंक होना चाहिए. पर मीडिया का रुख हवा के रुख के साथ बदलता दीखता है. मीडिया तार्किक समीक्षा, निष्पक्ष विचार और वस्तुस्थिति के सही आकलन के बजाय सनसनी फैलाकर टी आर पी बढाने के उद्देश्य से प्रेरित दीखती है. साथ ही जहां मीडिया सरकार के आगे भीगी बिल्ली बनी नजर आती है, अमूमन सरकार की गलतियों पर सरकारी अधिकारियों और सत्ताधारी दलों के नेताओं से कठोर प्रश्न नहीं पूछती. दूसरी तरफ सरकार का विरोध करनेवालों से उल जलूल, अतार्किक प्रश्न करती दीखती है. कभी कभी ऐसा लगा जैसे "न्यायाधीश" की भूमिका में आकर विरोधी के विपक्ष और सरकार के पक्ष में फैसले भी सुनाने लगती है. इसका मुख्य कारण मुझे सरकार की दमनकारी नीतियां और अलोकतांत्रिक रवैया लगता है. साथ ही कुछ पत्रकारों का निजी स्वार्थ और पत्रकारिता के उत्कृष्ट व्यवसाय को महत्व ना देकर सुविधाभोगिता को महत्व देना हो सकता है.

अब पहले से ही डरी, सहमी, कमजोर, नख दन्त विहीन मीडिया के ऊपर और अधिक पाबन्दी लगाना घायल और मरणासन्न पड़े लोकतंत्र को पूर्णतः समाप्त कर फासीवादी शक्तियों को और शक्तिशाली बनकर देश और देश की जनता को अपने शिकंजे में लेना है. जनता सोयी रहे और देश का अपमान, बलात्कार और लूट जारी रहे, यही इन फासीवादी सत्ताधारी लोगों की कामना है. अगर ऐसी ही स्थिति रही तो बिना आपातकाल के ही आपातकाल से बदतर स्थिति में रहेगा.

-राकेश चन्द्र

Friday, April 29, 2011

दिशाहीन युवा


एक दिन आधी रात को अचानक ऑफिस से निकलने के बाद मुझे 9वीं क्लास का अंग्रेजी का चैप्टर याद आ गया। इसमें बताया गया था कि आप अपने हाथ की छड़ी को वहीं तक भांज सकते हैं, जहां से किसी की नाक की शुरूआत होती है। करीब 16 साल पहले क्लास में बताई गई यह बात दिमाग में कौंध गई। हम चार लोग ऑफिस की गाड़ी से घर के लिए निकले थे। गाड़ी बड़ी मुश्किल से मिली थी, क्योंकि कई गाडिय़ां जो पहले लोगों को छोडऩे गईं थीं, वह द तर लौटी नहीं थीं। इससे पहले ऐसा तभी होता था, जब झमाझम बारिश हुई हो। लेकिन उस दिन बारिश नहीं हुई थी और सड़कों पर बहुत ज्यादा भीड़ नहीं थी, इसलिए गाडिय़ों के लौटकर नहीं आने पर थोड़ा आश्चर्य हुआ था। ऑफिस की गाड़ी हमें आईटीओ से लेकर इंडिया गेट की ओर चली। रास्ते में बाइक सवार कुछ युवक नारे लगाते हुए जा रहे थे। करीब एक-डेढ़ घंटा पहले ही क्रिकेट वल्र्ड के सेमीफाइनल मैच में भारत ने पाकिस्तान को हराया था। कुछ कार सवार लोग भी खिड़कियों से धड़ निकाल कर मैच में मिली जीत पर खुशी का इजहार कर रहे थे। तिलक मार्ग से इंडिया गेट सर्कल में प्रवेश करते ही गाडिय़ों के द तर न पहुंचने का माजरा समझ में आ गया। पूरी सड़क कारों और बाइक से अटी पड़ी थी। एक के पीछे एक गाडिय़ां लगी थीं। कुछ लोग कार की छतों पर चढ़कर चिल्ला रहे थे, तो कुछ डिग्गी खोलकर बैठ गए थे। कुछ आतिशबाजी भी कर रहे थे। इस तरह पूरा सर्कल भरा हुआ था। इन जोशीले युवाओं को इस बात से कोई मतलब नहीं था कि पूरा सर्कल बंद हो चुका है और किसी को कहीं जाना भी होगा। करीब 10 मिनट हम फंसे रहे, लेकिन पुलिस कहीं नजर नहीं आई और न ही बैरिकेड्स। किसी तरह ड्राइवर गाड़ी को पटियाला हाउस के पीछे से निकालकर रिंग रोड पर ले आया। यहां सड़क बंद तो नहीं थी, लेकिन आसपास से कारों और बाइक से गुजरने वाले जोश के प्रदर्शन में पीछे नहीं थे। मैं और दिनों की तुलना में करीब आधे घंटे देर से घर पहुंचा था। इस घटना के अगले दिन पुलिस जागी और उसका बयान आया कि वल्र्ड कप फाइनल के दिन पूरी सतर्कता बरती जाएगी। मैं आशंकित तो था, लेकिन बयान से थोड़ा सुकून मिला कि शायद सेमीफाइनल जैसा सड़कों पर कुछ न हो। वल्र्ड कप फाइनल जीतने के बाद लोगों का जोश चरम पर था। उस दिन हमारी गाड़ी आईटीओ से आगे नहीं बढ़ सकी थी। टाइम भी लगभग वही था। मैं यह समझ नहीं पा रहा था कि युवा गाडिय़ां लेकर इंडिया गेट और शहर के चौक-चौराहों पर जाम लगाकर कैसा सेलिब्रेशन कर रहे हैं। क्या जोश और जुनून में आकर बीच सड़क पर कूल्हे मटकाने और गला फाड़ कर भारत माता की जय चिल्लाने से ही देशभक्ति की भावना प्रदर्शित की जा सकती है। क्या यही वास्तविक देश और क्रिकेट प्रेमी होने की पहचान है। यदि यही देश प्रेम और क्रिकेट प्रेमी होने की निशानी है, तो ऐसा नहीं करने वालों को किस श्रेणी में रखा जाए?

Friday, April 8, 2011

हजारे और हकीकत


अन्ना हजारे एक ऐसी सरकार के मुखिया से भ्रष्टाचार के खिलाफ कठोर कानून बनाने की गुहार लगा रहे हैं जो अब तक सबसे भ्रष्ट साबित हुई है। एक बात समझ में नहीं आती कि भ्रष्ट लोगों के पनाहदाता से ही इसके खिलाफ कानून बनाने की मांग करते हुए आमरण अनशन करने का क्या अर्थ है। हजारे मनमोहन सिंह को कौन सी नई बात समझाने की कोशिश कर रहे हैं, जिससे वह अनजान हैं।
कहा जा सकता है कि महात्मा गांधी ने भी यही तरीका अपनाया था और उन्हें सफलता भी मिली थी। लेकिन ऐसा कहना पूरा सच कहने जैसा नहीं है, बल्कि पूरे घटनाक्रम के केवल एक अध्याय का जिक्र करना भर है। ऐसे अनेक अधिकृत दस्तावेज पड़े हैं, जिनसे यह बात स्थापित होती है कि भारत की आजादी केवल महात्मा गांधी की रणनीति का नतीजा नहीं था और ऐसा मानना मुगालते में रहने जैसा है।
हां मैं विषय से भटक गया, लेकिन पूरी तरह नहीं। चूंकि हजारे गांधी की बड़ी-बड़ी तस्वीरों के साथ जंतर-मंतर पर सत्याग्रह कर रहे हैं, इसलिए समय को थोड़ा पीछे ले जाना पड़ा।
मैं गांधी और हजारे जैसी हस्तियों का कतई विरोधी नहीं हूं और नहीं मुझे उनकी मंशा और क्षमता पर संदेह है, बल्कि मुझे उनके तरीके पर आपत्ति है। हजारे आमरण अनशन करके सरकार को इस बात के लिए राजी करने की कोशिश कर रहे हैं कि प्रस्तावित जन लोकपाल विधेयक का मसौदा तैयार करने में सरकारी तंत्र से बाहर के लोग भी शामिल किए जाएं और यह विधेयक भ्रष्टïाचार के खिलाफ कठोर कानून की शक्ल ले ले।
मुश्किल यह है कि जो सरकार भ्रष्टाचार के ईंधन से ही चल रही हो, वह हजारे की बात कैसे मान सकती है। ऐसी स्थिति में या तो हजारे रहेंगे या फिर सरकार। दूसरी संभावना ज्यादा है क्योंकि जाहिर है, कोई भी तंत्र खुद का अस्तित्व मिटाने का उपाय नहीं कर सकता और इसके लिए सत्याग्रह करना कतई व्यवहारिक नहीं है।
यह भी कहा जा सकता है कि सूचना का अधिकार कानून हजारे और उनकी राह पर चलने वाले लोगों की कोशिशें का नतीजा है। हो सकता है यह सही हो, लेकिन यह भी उतना ही सच है कि सूचना के अधिकार कानून से केवल भ्रष्टाचार के संकेत मिल सकते हैं, निवारण के उपाय नहीं। इसलिए सरकार के लिए यह कानून बनाना मुश्किल जरूर रहा होगा, लेकिन इसकी वजह से उसके अस्तित्व को कतई खतरा नहीं था।
दूसरा यह कि यदि सूचना के अधिकार की गुहार हजारे नहीं लगाते, तो कोई और लगाता और इस संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि सर्वोच्च न्यायालय सरकार को इस तरह के कानून बनाने के लिए बाध्य कर देती। जैसा कि उसने पीजे थॉमस (पूर्व मुख्य सतर्कता आयुक्त) और ए राजा (पूर्व संचार मंत्री) के मामले में किया है।
इसका मतलब यह नहीं है कि मैं हजारे को खारिज कर रहा हूं, बल्कि मैं यह कहना चाह रहा हूं कि वह सरकार को आत्महत्या करने के लिए कह रहे हैं। लेकिन सरकार भी कम शातिर नहीं है। वह बीच के रास्ते पर चलने के संकेत देने लगी है, जिसकी कोई व्यवहारिकता नहीं होती। हम या तो सच बोलते हैं या झूठ। इन दोनों के बीच बोलने का दावा या कोशिश छलावा है।
-भीम सिंह

Sunday, March 27, 2011

शादी के बाज़ार में

कई बार मुझे लगता है कि नौकरी मिलने के बाद जिंदगी का एक चैप्टर बंद तो होता है, लेकिन दूसरा शुरू भी हो जाता है। एक व्यक्ति को कई नई चुनौतियों से दो-चार होना पड़ता है। इसी में से एक है- शादी। शादी करने से पहले लड़का-लड़की की हालत एग्जाम देने जा रहे किसी स्टूडेंट की तरह रहती है। चाहे कितनी भी तैयारी हो उसे यह नहीं लगता कि पेपर अच्छे से कर पाएगा या खूब नंबर ला पाएगा। हमारे यहां शादियों में अगुआ (ऐसा व्यक्ति जो वर और वधू दोनों पक्षों को जानता है और शादी का प्रस्ताव लेकर सबसे पहले वही आता है) की अहम भूमिका रहती है।

समय के साथ-साथ शादियों में नए-नए अगुओं का चलन आ गया है। संचार क्रांति के युग में मैट्रिमनी साइट को किसी भी मायने में कमजोर अगुआ नहीं माना जा सकता। ऐसे ही एक दिन नेट सर्फिंग करते-करते मैं मैट्रिमनी साइट पर जा पहुंचा। इससे पहले तक मैं शादियों में सिर्फ लड़कों की पसंद के बारे में ही जानता था। लेकिन इस साइट पर मुझे लड़कियां कहीं से भी लड़कों से उन्नीस नहीं दिखीं। लड़कों की उम्र, कद-काठी से लेकर इनकम वगैरह की एक लंबी-चौड़ी लिस्ट थी। एक दो उदारवादी प्रोफाइल को छोड़ अधिकतर को मोटी तनख्वाह कमाने वाले पति की तलाश थी। पढ़ाई कर रही लड़की और उनके पैरंट्स ही प्रोफाइल से थोड़े उदार दिखे। जॉब कर रही लड़कियों को अपने से 3-4 गुनी अधिक सैलरी पाने वाला लड़का चाहिए था। हालांकि, लड़कों के पेशे के बारे में दोनों ही वर्गों के विचार एक जैसे थे।

लड़कियों और उनके परिवार वालों के पसंदीदा पेशे थे -आईएफएस/आईएएस/आईपीएस, डॉक्टर, इंजीनियर, लेक्चरर, सीए, सीएस, एमबीए/बीबीए, बैंक पीओ/क्लर्क और सॉफ्टवेयर इंजीनियर। मैंने सैकड़ों लड़कियों के प्रोफाइल देखे। लेकिन किसी ने भी अपने पसंदीदा पेशे में जर्नलिज्म को शामिल नहीं किया था। अपने पेशे को फेवरिट न जानकर थोड़ा आश्चर्य हुआ। मुझे करीब 5 साल पहले का वह वाकया याद आ गया, जब मैंने घर में बताया था कि मैं पत्रकार बनना चाहता हूं। मेरे घर वालों को इस क्षेत्र में करियर नजर नहीं आ रहा था। हालांकि, उन्होंने इसका जोरदार विरोध नहीं किया। घर वालों ने इस पेशे के प्रति सिर्फ अपनी नापसंद जाहिर की थी। अब मैं उनकी मन:स्थिति समझ सकता था कि आखिर क्यों उन्हें यह पेशा पसंद नहीं था। आज भी लोग परंपरागत पेशों मसलन इंजीनियरिंग, मेडिकल और सरकारी नौकरी को शादी के लिए तरजीह देते हैं। पता नहीं जो लोग नौकरी नहीं करते उनसे शादी के लिए कौन तैयार होगा? साफ है कि समाज आज भी जर्नलिज्म को शादी योग्य पेशा नहीं मानता या कहा जा सकता है कि शादी के बाजार में यह पेशा बिकाऊ नहीं है।

बाजारवाद के युग में समाज में पैसा ही सबसे बड़ा मूल्य हो गया है। क्यों नहीं वैवाहिक विज्ञापनों में कहा जाता है कि हमें सच्चरित्र और ईमानदार पति चाहिए। आखिर विवाह जैसे संबंध में रूप और धन का ही इतना बोलबाला क्यों है?

Friday, January 14, 2011

एक अज़ीज की याद में


किसी के बहुत करीब होना जितना सुखद है उसी अनुपात में दुखद भी। शायद यही वजह है कि ज्यादातर पति-पत्नी एक-दूसरे को झेलते हैं और स्वतंत्र खयाल रखने वालों की शादी ज्यादा दिन तक नहीं टिकती। सामान्य तौर पर लोग हर चीज को जीत और हार के रूप में देखने के आदी होते हैं। इस प्रवृत्ति से तल्खी बढ़ती है और कुदरती व्यवहारकुशलता कहीं खो जाती है। इसके असर से सब कुछ औपचारिकता में तब्दील हो जाता है। यानि व्यवहार में बनावटीपन आने लगता है।
कई मौकों पर हमारी गतिविधियां सामने वाले को केवल खुश करने के लिए होती है या फिर चिढ़ाने के लिए। मतलब यह कि स्वाभाविक व्यवहार की गुंजाइश धीरे-धीरे कम होती जा रही है। जो लोग स्वाभाविक व्यवहार वाले होते हैं, उन्हें सीधा (बेवकूफ) कहकर परोक्ष रूप से मजाक बनाने की कोशिश की जाती है।
मेरे एक पत्रकार मित्र की व्यवहारकुशलता और विनम्रता की बड़ी ख्याति है। लेकिन मैं और उसके कुछ अन्य करीबी मित्र उसकी खिल्ली उड़ाते हैं और वह झेंप जाता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि हमलोग उसकी कमियां जानते हैं और बाहरी दुनिया उसकी खूबियां जानती है। लेकिन यह भी सच है कि हम सब आपस में जितना मस्ती कर लेते हैं, उस तरह की मस्ती कहीं और संभव नहीं है।
- भीम सिंह

Friday, November 26, 2010

मनमोहन प्रभाव


विकास के मुद्दे पर बिहार के नीतीश कुमार प्रचंड बहुमत के साथ एक बार फिर सत्ता पर काबिज हो गए। मनमोहन सिंह भी भारतीय अर्थव्यवस्था को चमकाने का सपना दिखाकर दूसरी बार प्रधानमंत्री बने हैं। नीतीश कुमार की नीतियों का वास्तविक असर आने वाले समय में दिखेगा, लेकिन मनमोहन सिंह की नीतियों के प्रभाव धीरे-धीरे सामने आने लगे हैं। वर्ष 1991 में वे केंद्रीय वित्त मंत्री बने थे और तभी से उदारीकरण की नीति अपनाकर उन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खूब वाहवाही लूटी थी। उनकी दूसरी पारी तब शुरू हुई, जब वे तकरीबन 6 वर्ष पहले सोनिया गांधी की कृपा से प्रधानमंत्री बने। उनके मौजूदा कार्यकाल और पिछले कार्यकाल को भारत की तगड़ी आर्थित तरक्की के रूप में देखा जा रहा है। लेकिन अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं और संगठनों की ओर से जो रिपोर्ट जारी हो रही है, उनसे तो कम-से-कम यही लगता है कि उनके कार्यकाल में देश की अंदरुनी हालत बदतर हुई है।

वॉशिंगटन स्थित 'ग्लोबल फाइनेंशियल इंटिग्रिटी' की एक अध्ययन रिपोर्ट के मुताबिक आजादी के बाद कर की चोरी, अपराध और भ्रष्टïाचार के कारण भारत को कम-से-कम 450 अरब डॉलर का नुकसान हुआ है। हाल ही में उजागर हुए दूसरी पीढ़ी (2जी) का स्पेक्ट्रम घोटाला पौने लाख करोड़ रुपये का है। यह रकम उससे 10 गुनी है। रिपोर्ट कहती है कि इस घाटे के पीछे पूंजपति वर्ग और नीजि कंपनियों की बड़ी भूमिका रही है।

इस रिपोर्ट के मुताबिक कर से बचने, गलत तरीकों से की गई कमाई, पूंजी को गुप्त रखने की प्रवृत्ति, घूसखोरी, भ्रष्टïाचार और गैरकानूनी धंधे छुपाने की कोशिशों के चलते यह धन भारत से विदेश चला गया। तेजी से देश से बाहर जाते धन का सीधा ताल्लुक देश में अमीर और गरीबों के बीच बढ़ते फासले से है। अमीर के पास ज्यादा पूंजी है, जिसे वह विदेश में छुपा रहा है। इसलिए गरीबों के लिए चलाई जा रही योजनाओं में जरूतर से कम खर्च किया जा रहा है। यानि विकास और उन्नति के लिए काम कम किए जा रहे हैं।

यह रिपोर्ट कहती है कि वर्ष 1991 में भारतीय अर्थव्यवस्था के उदारीकरण के बाद यह घाटा बढ़ा है। इस तमाम घाटे का 68 फीसदी उदारीकरण के बाद ही हुआ। यानि निजी कंपनियों के लिए बाजार खोले जाने के बाद से पूंजीगत अपराधीकरण तेजी से बढ़ा है। जैसे-जैसे उदारीकरण की नीति आगे बढ़ती गई, देश से पैसा बाहर जाने की तीव्रता भी उसी गति से बढ़ी। मसलन, भारत से काला धन दूसरे देशों में जानी की गति पिछले 5 वर्षों में सबसे तेज रही।

दूसरी ओर दुनिया भर के अमीरों पर नजर रखने वाली पत्रिका 'फोब्र्स' के मुताबिक वर्ष 2009 में भारतीय अरबपतियों की संख्या दोगुनी हो गई। वर्ष 2008 में 24 भारतीय अबरपति थे, जिनकी संख्या वर्ष 2009 में 49 हो गई। इसके उलट ग्रामीण विकास मंत्रालय की ओर से राज्यसभा को दी गई जानकारी के मुताबिक वर्ष 2004-05 के दौरान भारत में गरीबी रेखा से नीचे गुजर-बसर करने वाली आबादी 30.17 करोड़ थी। जाहिर है, पिछले 5 वर्षों दौरान यह संख्या भी तेजी से बढ़ी है। मतलब यह कि देश में जिस गति से अरबपतियों की संख्या बढ़ रही है, उसी तीव्रता से गरीबी भी बढ़ रही है। ऐसे में यह सवाल उठना स्वभाविक है कि कथित रूप से आर्थिक महाशक्ति में तब्दील होते हमारे देश में गरीबी और अमीरी समान अनुपात में किस वजह से बढ़ रही है? इसी के साथ-साथ विदेशों में जाने वाले काले धन की मात्रा में भी दिनोंदिन इजाफा हो रहा है।

हाल ही में विश्व स्वस्थ्य संगठन ने भी एक रिपोर्ट जारी की है, जिसके निष्कर्ष चौंकाने वाले हैं। इस रिपोर्ट के मुताबिक बीमारियों के इलाज पर होने वाले भारी खर्च की वजह से सालाना 10 करोड़ लोग गरीब हो रहे हैं। भारत जैसे कुछ देशों में प्रत्येक वर्ष 5 फीसदी आबादी इसलिए गरीब हो जाती है क्योंकि उन्हें स्वास्थ्य सेवाओं पर जरूरत से ज्यादा खर्च करना पड़ता है। यह रिपोर्ट कहती है कि करोड़ों लोग बीमारियों से इसलिए मर रहे हैं क्योंकि उनके पास इलाज करवाने के लिए धन नहीं है। ऐसे लोगों की संख्या भी लाखों में है, जो इलाज शुरू तो कर लेते हैं, लेकिन इसे जारी रखने के लिए उनके पास पर्याप्त धन नहीं होता और अंतत: उनकी मौत हो जाती है।

इस रिपोर्ट में वर्ष 2007 में किए गए 'हार्वर्ड विश्वविद्यालय' के एक अध्ययन का हवाला दिया गया है, जिसके मुताबिक भारी-भरकम मेडिकल बिल की वजह से 62 फीसदी परिवार दीवालिया हो जाते हैं।

जाहिर है, मौजूदा विकास की नीति और पैमाना चिंताजनक रूप से दोषपूर्ण हैं। आंकड़े और तथ्य यह भी दर्शाते हैं कि मनमोहन सिंह की उदारीकरण एवं तेज विकास की नीति ने देश की अर्थव्यवस्था का बाहरी आवरण तो चमका दिया है, लेकिन इसके नतीजे गंभीर हैं। अरबपतियों की संख्या दिनोंदिन बढ़ते जाने, बाजार का विस्तार और कॉर्पोरेट जगत की मजबूत होती हुई स्थिति विकास के पैमाने कतई नहीं माने जा सकते क्योंकि इसी अर्थव्यवस्था के गवाह करोड़ों लोग दिनोंदिन गरीब होते जा रहे हैं, बीमारी के कारण मरने वाले लोगों की संख्या में इजाफा हो रहा है और भ्रष्टाचार एवं घोटालों के मामले तमाम सीमाएं लांघ चुके हैं।
विभिन्न रिपोर्ट एवं आंकड़ों से जाहिर होता है कि वर्ष 1991 में जब मौजूदा प्रधानमंत्री वित्त मंत्री बने थे और उन्होंने उदारीकरण की नीति अपनाते हुए देश की अर्थव्यवस्था को खुले बाजार की पटरी पर दौड़ाई थी, तभी से वित्तीय और पूंजीगत अपराधीकरण के साथ-साथ भ्रष्टाचार की प्रवृत्ति भी तेज हो गई। यह भी स्पष्टï है कि मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री बनने के बाद ये प्रवृत्तियां ज्यादा बेलगाम हुई हैं।

दरअसल, भारतीय अर्थव्यवस्था मिश्रित प्रणाली की है, जिसमें राज्य का कामकाज उन आधारभूत नीति से बहुत ज्यादा प्रभावित होता है, जिसके तहत निजी अर्थव्यवस्था संचालित होती है। मतलब यह कि सरकार के आर्थिक एवं अन्य फैसलों का सीधा असर जनता पर होता है। जाहिर है, मौजूदा हालात के लिए सीधे-सीधे हमारी सरकार जिम्मेदार है।

-भीम सिंह

Tuesday, September 14, 2010

कॉमनवेल्थ गेम्स की जान-दिल्ली

देश की राजधानी में होने वाले कॉमनवेल्थ गेम्स के सफल आयोजन को लेकर शायद ही किसी को शंका न हो। सबके पास इसको लेकर अलग-अलग विचार हैं। अधिकतर को गेम्स के सफल आयोजन को लेकर मन में खटका है। यदि हम ये मान लें कि ऐसी नकारात्मक सोच वाले मुट्ठी भर लोग ही हैं तो हम दुनिया में सबसे अधिक सकारात्मक सोच रखने वाले व्यçक्त होंगे। यदि गेम्स सफल हो जाते हैं (सफल तो होना ही है) तो ये उलझन रहेगी कि सफलता का श्रेय किसे दिया जाए? श्रेय लेने वाले की सूची में गेम्स की आयोजन समिति, केन्द्र और दिल्ली सरकार तथा इसका विरोध करने वाले कुछ लोगों के नाम भी शामिल होंगे।

गेम्स का विरोध करने वालों का नाम इसलिए कि उनके गेम्स के आयोजन विरोधी बयान से आयोजन समिति को नई ऊर्जा मिली। इससे समय पर गेम्स से सम्बंधित कामों को पूरा करने में फायदा हुआ होगा। समिति ने सफल आयोजन कर विरोधियों को करारा जवाब देने के लिए कमर कस ली होगी। इसलिए विरोधियों की भूमिका को नज़रअन्दाज नहीं किया जा सकता।

देश के प्रधानमन्त्री ने खेल के आयोजन स्थल का दौरा कर तैयारियों का जायजा लिया इसलिए यदि गेम्स सफल होते हैं तो केन्द्र सरकार को भी इसका श्रेय दिया जाना चाहिए। प्रधानमन्त्री का गेम्स से कोई सीधा सम्बंध तो नहीं है, फिर भी उन्होंने इसमें रुचि दिखाई, अपना कीमती वक्त निकाला और आयोजन स्थल का दौरा किया। इसके लिए कृतज्ञता तो प्रकट करनी ही चाहिए। भले ही वे अपने फील्ड में असफल रहे हों और उनका अर्थशास्त्र आम आदमी के काम न आया हो। इस पर ध्यान देने की जरूरत नहीं।

दिल्ली सरकार को इस बात का पूरा श्रेय मिलना चाहिए कि उसने गेम्स को सफल बनाने के लिए बहुत कुछ किया। बनागी देखिए, दिल्ली को खूबसूरत और आकर्षक बनाने के लिए कई जगहों पर गड्ढे खुदवा दिए। ताकि उसमें बारिश का पानी जमा हो जाए और डेंगू, मलेरिया तथा चिकनगुनिया जैसी बीमारियों के मच्छर उनमें बड़ी आसानी से पनप सकें। गेम्स के दौरान आनेवाले मेहमानों को आखिर सौगात में हम क्या देते। इससे ये समस्या भी हल हो गई। इस योजना से खुश होकर मच्छरों के सरदार ने भी दिल्ली सरकार को एक विशेष पुरस्कार देने के बारे में गम्भीरता से विचार कर रहा है।

गेम्स के आयोजन को सफल बनाने के लिए गीत भी लॉन्च किए गए। पहले सिर्फ एक गीत से काम चलाने की योजना थी, लेकिन गीत को लॉन्च करने के बाद लगा कि इसमें थोड़ी कमी रह गई है। इस कमी को पूरा करने के लिए दो और थीम सॉन्ग लॉन्च कर दिए गए। दूसरे थीम सॉन्ग में दिल्ली को जान बताया गया। इस तरह गीत से भी खेलों की तैयारियों में जान डालने की कोशिश की गई। प्रफेशनल सिंगर के साथ-साथ दिल्ली की मुखिया ने भी अपनी थरथराती आवाज में कुल लाइन गाया, ताकि गेम्स की तैयारियों को मजबूती मिल सके।

और अन्त में नंबर आता है आयोजन समिति के अध्यक्ष का, जिन्होंने बड़ी दिलेरी से हेरफेर के आरोपों और नाकामी की बद्दुआ का सामना किया। उन्होंने सभी आरोपों का न केवल जवाब दिया बल्कि जांच के लिए तैयार होने की बात भी कही। उनकी दिलेरी और गेम्स के सफल बनाने के जज्बे को सलाम करते हुए श्रेय देने की सूची में उनका नाम सबसे ऊपर आना चाहिए। इससे उनको हौसला मिलेगा और हमें ओलिंपिक जैसे बड़े खेलों की मेजबानी का मौका दिलाने में भी उनका अनुभव काम आ सकता है। यदि तब कोई बड़ा आरोप लगेगा तो उसे भी वे अपनी दिलेरी से सामना कर सकते हैं। क्योंकि हम धीरे-धीरे ही सही लेकिन आगे ओलिंपिक वाले ही रास्ते पर जा रहे हैं। एशियन और कॉमनवेल्थ के सफल आयोजन के बाद नंबर तो इसी का आएगा।

Wednesday, July 14, 2010

अब ऑक्टोपस बाबा की चांदी

विश्वकप के समापन के साथ ही फुटबॉल और वुवुजेला का शोर थम गया लेकिन ज्योतिषाचार्य ऑक्टोपस जी महाराज की भविष्यवाणी की गूंज अब भी फिजाओं में बरकरार है। लोग भले ही 19वें फुटबॉल विश्वकप के घटनाक्रम को भूल जाएं लेकिन ऑक्टोपस जी महाराज वर्षो तक उनके जेहन में जरूर रहेंगे। ऑक्टोपस जी महाराज को नवीनतम ज्योतिषाचार्य की पदवी विश्वकप से ही तो मिली है! इनकी शत-प्रतिशत सफलता भाग्य में यकीन रखने वालों के लिए ऑक्सीजन से कम नहीं और ये सारे लोग जर्मनी की ओर कूच करने को बेताब हैं, ताकि कल के बारे में सही-सही जानकारी मिल सके!

गली के मोड़ पर चाय की दुकान चला रहे रामू को फिक्र है कि आने वाले दिनों में उसका बिजनेस कैसा रहेगा। उसे यह डर सता रहा है कि कहीं लोग चाय पीना बंद तो नहीं कर देंगे। रामू यह भी जानना चाहता है कि अब दूध के दाम कब बढ़ेंगे? चाय की कीमत और कितनी ऊपर जाएगी और चीनी रुकेगी भी या नहीं। हां, दाल की कीमतों से उसका कोई खास लेना-देना नहीं है।

पिछले हफ्ते कॉलेज में कदम रखने वाली हमारे पड़ोसी वर्मा जी की बेटी भी ज्योतिष ऑक्टोपस की सफलता से मंत्रमुग्ध है। वह ऑक्टोपस जी महाराज से जानना चाहती है कि कॉलेज में उसे कनखियों से देखना वाला लड़का कब तक उसके इशारे पर नाचने लगेगा। क्या उस क्यूट लड़के से उसका अफेयर सफल रहेगा? वह जानना चाहती है कि उसके मम्मी-पापा इससे नाराज तो नहीं होंगे या वह उन्हें शादी के लिए मनाने में कामयाब तो हो जाएगी?

शर्मा जी का बेटा ऑक्टोपस जी महाराज को अपने घर में लाकर रातों-रात करोड़पति बनने का ख्वाब देख रहा है! वह शर्मा जी को मनाने में लगा है कि एक बार उसे जर्मनी जाने की इजाजत दे दें। बस, वह करोड़पति बनने के सूत्र के साथ वापस लौट अएगा! सीधे-सादे शर्मा जी अपने बेटे के इस उत्साह को समझ नहीं पा रहे हैं। वह उससे कॉलेज की कट-ऑफ सूची देख आने की जिद कर रहे हैं!

मैं इन सबों को देख कर हैरत में हूं कि इससे जर्मनी को कितना फायदा होगा। बिना कुछ किए ही उसे कितने पर्यटक मिल रहे हैं! मंदी के बाद तो ऑक्टोपस जी महाराज ने उसके वारे-न्यारे करा दिए। एक हम हैं, जो करोड़ों रुपए खर्च कर और शहर में जगह-जगह गड्ढे खोद कर पर्यटकों को लुभाने के सूत्र पर चल रहे हैं। मुङो इस बात का अफसोस भी है कि हम अपने पुराने भविष्यवक्ता तोते की ब्रांडिंग को भुनाने में असफल रहे! चलिए कम से कम सबक तो मिला ही।

Wednesday, July 7, 2010

फुटबॉल एक जादुई खेल!


वाकई फुटबॉल एक जादुई खेल है, जिसके सम्मोहन में अधिकांश खेल प्रेमी बंध गए हैं। अपना देश फुटबॉल वर्ल्ड कप में हिस्सा नहीं ले रहा है बावजूद इसके फुटबॉल का जादू खेल प्रेमियों के सिर चढ़ कर बोल रहा है। खेल प्रेमियों से लेकर खेल की खबर पहुंचाने वाले तक इसकी खुमारी से बच नहीं पाए हैं।

फुटबॉल का सम्मोहन वलर्ड कप के आयोजन के दिन से ही है। लीग मैचों में हिस्सा लेने वाले कई छोटे-छोटे देशों को खेल प्रेमी जानते भी नहीं थे। लेकिन अपनी चहेती टीम और खिलाड़ियों को समर्थन करने वाले खेल प्रेमी पौ फटने तक सूजी हुई आंखों के साथ टीवी से चिपके रहे। फुटबॉल का सम्मोहन इतना मजबूत है कि भारत द्वारा 15 साल बाद क्रिकेट का एशिया कप जीतने की खबर अखबार के खेल के पन्ने के एक कोने में सिमट कर रह गई। इससे साफ जाहिर है कि फुटबॉल का नशा चारों ओर है। इसके आगे क्रिकेट और टेनिस सब की चमक फीकी है। अपने देश के पूर्व क्रिकेटर (सौरभ गांगुली) भी क्रिकेट की बजाए फुटबॉल वर्ल्ड कप की संभावनाओं पर कलम चला रहे हैं। इस दौरान इंग्लैंड में विम्बलडन चल रहा है लेकिन फुटबॉल और वुवुजेला के आगे रोजर फेडरर और राफेल नडाल सहित टेनिस की सुंदरियों का जादू भी नहीं चल पाया।

एक मजेदार बात यह भी है कि फुटबॉल वर्ल्ड कप के दौरान ही दूसरे खेलों में कई महत्वपूर्ण परिणाम सामने आए। उदाहरण के लिए क्रिकेट के एशिया कप को ही ले लिया जाए या साइना नेहवाल का इंडोनेशिया सुपर सीरीज जीतना। नेहवाल का यह लगातार तीसरा खिताब था तो भारतीय क्रिकेट टीम ने डेढ़ दशक बाद एशिया कप जीता। क्रिकेट के दीवाने अपने देश में फुटबॉल का जुनून देखकर सिर्फ अचरज ही किया जा सकता है!

हालांकि फुटबॉल का असली जादू तो प्री-क्वार्टर फाइनल से शुरू हुआ। क्वार्टर फाइनल में फाइनल जीतने की दावेदार दो मजबूत टीम-ब्राजील और अर्जेटीना बाहर हो गईं। ब्राजील को हॉलैंड ने हराया जबकि जर्मनी ने अर्जेटीना को बाहर का रास्ता दिखा दिया। इसके बाद खेले गए पहले सेमीफाइनल में हॉलैंड ने उरुग्वे को हराकर फाइनल में प्रवेश किया। फाइनल में पहुंचने वाली दूसरी टीम का फैसला आज देर रात खेले जाने वाले जर्मनी और स्पेन के मैच से होगा।

फाइनल में चाहे जिन दो देशों के बीच मुकाबलो हो फुटबॉल वर्ल्ड कप के कई आश्चर्यजनक परिणामों को देखते हुए फुटबॉल को चमत्कारी और जादुई खेल कहा जाए तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। बस, अब इस चमत्कारी खेल के समापन में कुछ रोज ही बचे हैं। जमकर मजा लीजिए इस खेल का!

Friday, July 2, 2010

बड़ा उलटफेर- ब्राज़ील बाहर

विश्व कप फुटबॉल में इस बार के सबसे बड़े उलटफेर में कप की प्रमुख दावेदार और पांच बार की विश्व विजेता टीम ब्राजील क्वार्टर फाइनल में नीदरलैंड से 2-1 से हारकर प्रतियोगिता से बाहर हो गई। ब्राजील को जसे खुद इस परिणाम पर यकीन नहीं था। उसे फीफा ने पहली वरीयता की टीम घोषित किया था।

ब्राजील की पराजय से दक्षिण अफ्रीका में चल रही प्रतियोगिता की चमक कुछ फीकी पड़ गई क्योंकि पहले विश्व कप से अब तक विश्व स्तर पर फुटबॉल का इतिहास दरअसल ब्राजील का इतिहास रहा है। ब्राजील ने 1958, 62, 70, 94 और 2002 का कप जीता था और 1950 व 1998 में वह उप विजेता रहा।

शनिवार को ब्राजील ने मुकाबले की शुरुआत धमाकेदार ढंग से की और 10वें मिनट में रोबिन्हो ने गोल कर टीम को 1-0 की बढ़त दिला दी। इसके पहले एक गोल और हो सकता था लेकिन रोबिन्हो के इस गोल को ऑफ साइड होने की वजह से नकार दिया गया। आधे समय तक ब्राजील की बढ़त कायम रही लेकिन उत्तरार्ध लगभग पूरी तरह नीदरलैंड का रहा, जिसकी शुरुआत ब्राजील की अपनी गलती से हुई। 53वें मिनट में ब्राजील के फेलिप मेलो का एक हेडर सीधा गोल में चला गया और इस आत्मघाती गोल ने स्कोर बराबर कर दिया।

कदम-कदम से मिलती मंजिल

एफएम रेडियो चैनल अक्सर श्रोताओं से कोई आसान-सा सवाल पूछकर सही जवाब देने वालों को गिफ्ट हैम्पर, गिफ्ट वाउचर और फिल्म के कपल टिकट आदि देते हैं। ऐसे ही एक हिट एफएम चैनल के भारी भरकम आवाज वाले आरजे ने श्रोताओं से एक आसान-सा सवाल किया। सवाल था-गर्लफ्रेंड बनाने के कुछ जोरदार नुस्खे बताइए? भले ही आरजे को यह सवाल आसान लगा हो लेकिन यह सवाल कतई आसान नहीं! उनके लिए तो बिल्कुल ही नहीं जो गर्लफ्रेंड बनाने में फेल हो गए हों! हालांकि चैनल को ढेर सारे जवाब मिले उन्हीं में से एक श्रोता का जवाब कुछ यूं था-

स्टेप-1 : सबसे सस्ता और बेहतर नेटवर्क वाली कंपनी का सिम कार्ड ले लें। इससे आप एसएमएस और कॉल के जरिए सुबह से लेकर देर रात तक लड़की के संपर्क में रह सकते हैं! ये जमाना चिट्ठी-पत्री का नहीं, बल्कि बहुत तेज चलने वालों और संचार क्रांति का है। आपके मोबाइल में हमेशा बैलेंस भी होना चाहिए। क्योंकि आपको मिस्ड कॉल आते ही कॉल करना होगा और आधी रात के बाद गली वाले मंगू की परचून की दुकान खुली नहीं मिलेगी!

स्टेप-2 : इसके बाद जो सबसे जरूरी काम है उसके लिए जिम ज्वाइन करें। जिम में चौड़े सीने और बलिष्ठ भुजाएं बनाने से पहले कमर और गर्दन को लचीला बनाने वाले व्यायाम की प्रैक्टिस करें। क्योंकि सबसे ज्यादा इन्हें ही झुकाना पड़ेगा। गर्दन और कमर जितनी लचीली होगी गर्ल उतनी जल्दी आपकी फ्रेंड बन जाएगी! अब आप भुजाओं को बलिष्ठ बनाने की तैयारी कर सकते हैं क्योंकि पहले भुजाओं को मजबूत बनाने वाले लोग गर्लफ्रेंड बनाने में असफल रहे हैं!

स्टेप-3 : अब तक आपकी गाड़ी पटरी पर आ चुकी होगी। इसलिए जोश में आकर चांद-सितारे तोड़ कर लाने की बात हरगिज न करें, क्योंकि आजकल लड़कियां भी बड़ी तेज होने लगी हैं। उन्हें पता है कि चांद पर अमेरिका का कॉपीराइट है। अमेरिका की इजाजत के बिना कोई चांद के बारे में सोच भी नहीं सकता! भारत के चंद्रयान -1 पर भी उसने अपने यंत्र लगाकर पानी का पता लगाने का श्रेय हासिल कर लिया। इसलिए बातों को पिज्जा, बर्गर, फ्रेंच फ्राई, कोल्ड ड्रिंक्स और कॉफी के आसपास ही घुमाते रहें! लड़की की नजर में आपकी छवि वास्तविक इंसान की बन जाएगी और वो आपकी ओर आकर्षित हो जाएगी।

एफएम का आरजे जवाब पाकर कुर्सी से लगभग उछल गया! उसने इतने सटीक और काम आने वाले जवाब की कल्पना नहीं की थी। आरजे ने जवाब देने वाले श्रोता की तारीफ अपने बॉस से की और उसे रात का शो एफएम लव का तड़का दिलवा दिया। आज जवाब देनेवाला श्रोता एक सफल लव गुरु है!

Thursday, June 24, 2010

'खेल-प्रेमी' की दुविधा

खेलों के दीवाने मेरे एक मित्र आजकल बड़ी परेशानी में हैं। हालांकि उन्हें खेलों का दीवाना कहने की बजाय क्रिकेट का दीवाना कहना उचित होगा। क्योंकि वे क्रिकेट छोड़कर अन्य कोई खेल में रुचि में नहीं रखते। लेकिन उन्हें 'खेल-प्रेमी' ही कहलाना पसंद है! उनकी परेशानी का कारण क्रिकेट की खबरों का टीवी और अखबार से गायब हो जाना है। क्रिकेट की जगह फुटबॉल ने ले ली है। उन्हें क्रिकेट की खबरें इन दिनों खेल के पन्नों पर हमेशा की तरह पढ़ने को नहीं मिल पा रही हैं। चार-पांच पन्नों तक फैली खेल की खबरों में क्रिकेट की खबर कहीं कोने में दुबकी हुई पड़ी मिलती है। जसे बिल्ली से जान बचाकर भागा, डरा हुआ कोई चूहा!

मेरे मित्र को इसका कारण समझ में नहीं आ रहा था। कई तरह की बातें उनके अंदर खलबली मचा रही थीं। उन्होंने अपने तर्क प्रस्तुत किए- क्रिकेट का एशिया कप चल रहा है। उसमें भारत की क्रिकेट टीम भी हिस्सा ले रही है। फुटबॉल वर्ल्ड कप में तो हमारी टीम भी नहीं है। एशिया कप में हमारी टीम ने पाकिस्तान को धूल भी चटा दिया। हम फाइनल में भी पहुंच गए हैं। एशिया कप में जिम्बाब्वे भेजी गई दोयम दज्रे की टीम भी नहीं है। फिर भी अपने यहां क्रिकेट की खबरों का ये हश्र! खबरें पन्ने की पेंदी में चिपकी हुई हैं! ये सब कहते-कहते वे तैश में आग गए। मैंने अनुमान लगाया कि इस दौरान उनका बीपी जरूर बढ़ गया होगा! मित्र ने कहा-ये तो खेल के साथ सरासर अन्याय है। क्रिकेट, क्रिकेटर और क्रिकेट प्रेमियों का अपमान है! उनके तमतमाए हुए चेहरे को देखकर कोई भी अंदाजा लगा सकता था कि देश में एक और गदर बस होने ही वाला है! खेलों के इतिहास का पहला गदर!

मित्र के सामने मैंने एक गिलास ठंडा पानी रख दिया। उन्होंने गिलास को लपक लिया। मेरे मित्र ने ब्रेक के बाद भी अपनी बातें जारी रखीं। उन्होंने आशंका जतायी कि कहीं ‘क्रिकेट के भगवान' के टीम में न रहने से ऐसा तो नहीं! वे डर गए कि टीम में ‘क्रिकेट के भगवान' के न रहने से ये हो सकता है तो उनके संन्यास के बाद क्या होगा! उनके लिए यह अकल्पनीय था!

मैंने उन्हें समझाया कि हौसला बनाए रखिए। आप ये भी तो देखें क्रिकेट की गेंद, फुटबॉल से कितनी छोटी है। आपके क्रिकेट में एक ही भगवान हैं, जबकि फुटबॉल की दुनिया में अनेक भगवान हैं! साथ ही फुटबॉल के मैदान में वुवुजेला जसा अनोखा वाद्य यंत्र है और आकर्षक सुंदरियों की भी कमी नहीं है। क्रिकेट को छोड़ फुटबॉल के साथ-साथ इन सबका मजा लीजिए, बस!

Monday, June 14, 2010

नमक बिन सब सूना

मन्नू ने जब पहली दफा कॉलेज में कदम रखा तो उसे अपने चारों ओर का माहौल बड़ा ही खुशगवार लगा। कैंपस की चमक-दमक ने सीधे-सादे मन्नू को करीब-करीब बेसुध कर दिया था। इतने रंग एक साथ उसने इससे पहले कभी नहीं देखे थे। उसने पहली बार महसूस किया कि वह अब तक कुएं की मेढक की तरह था। उसने बाहर की दुनिया देखकर राहत की सांस ली।

हालांकि हमारे समय में कॉलेज में पहुंचने से पहले तक बहुत कम लोग ही कुछ महसूस करने लायक होते थे। लेकिन आजकल तो नर्सरी के बाद ही अधिकांश को कुछ न कुछ होने लगता है। और तो और वे महसूस करने में बहुत आगे निकल चुके हैं! इस मामले में अब तो रोज ही रिकॉर्ड बनते और टूटते हैं, जिसे संग्रह करके रखना लोहे के चने चबाने से तनिक भी कम नहीं! अपना मन्नू तो नर्सरी क्लास वालों से भी पीछे था। लेकिन उसे कॉलेज में पहुंचने तक इस बात का अहसास तक नहीं था।

मन्नू अपने आसपास की हलचल से रोमांचित था। लेकिन हलचल के बनावटीपन से व्यथित भी। वह भी हलचल का हिस्सा बनना चाहता था। इसके लिए उसने हाथ-पांव मारे। डरते-डरते ही सही। गलत-सही सभी जगहों पर! कैंपस के बाहर मैक डी और बरिस्ता से लेकर कैफे कॉफी डे तक। सभी जगह चेहरे पर मुस्कान लिए, बोझिल मन से उसने शीश झुकाया। लेकिन ये काफी नहीं था शायद!

मन्नू वास्तविकता छिपाने में कामयाब नहीं हो सका या किसी घाघ से मात खा गया! इस उधेड़बुन में वह आज भी है! लेकिन इसका परिणाम हुआ कि वह बहुत देर तक रेस में खुद को शामिल नहीं रख सका। इसके अलावा भी रेस में बने रहने के लिए ढेर सारी कुर्बानी देने को वह तैयार नहीं था। क्योंकि उसे डर था कि रेस का विजेता बनने के बाद भी आकाश की ऊंचाई नहीं बदले में उसे खाई ही मिलेगी! सारे प्रकरण से मन्नू को जो अनुभव मिला वह बेशकीमती था। वह इसे महसूस भी करता था। अब वह चेहरे की सेल्स गर्ल वाली मुस्कान को भांप कर सतर्क हो जाता! यही हंसी कभी आग भड़काने का काम करती थी।

मन्नू ने कॉलेज में जाने पर पहली बार जो महसूस किया वह आजकल के तय मानकों से काफी नीचे की चीज थी। बिल्कुल स्तरहीन! लेकिन इसमें उस बेचारे का कोई दोष नहीं था। यह तो उसका स्वभाव था। पूरी तरह शुद्ध! टीवी पर दिखाए जाने वाले किसी ब्रांडेड नमक के विज्ञापन की तरह! शायद यही कारण था कि उसका शुद्ध खारापन किसी को आकर्षित नहीं कर पाया। लेकिन सच यही है कि नमक के बिना किसी भी विधि से पकाया व्यंजन फीका ही रहता है!

Wednesday, May 26, 2010

आखिर कुछ तो बदले!

अपना देश दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है। लोकतंत्र में जनता सर्वोपरि होती है। यह शासन जनता के लिए होता है। लेकिन बेचारी जनता ही सरकारी नीतियों से जन्मे बोझों के नीचे दबी है! मौज है तो जनता के प्रतिनिधियों की। इसलिए लोकतंत्र की परिभाषा में थोड़ा बदलाव कर उसमें जनता की जगह प्रशासक जोड़ देना चाहिए। लोकतंत्र यानी प्रशासकों का तंत्र!

सरकार बदलती रहती है, लेकिन जनता की नियति में रत्ती भर भी रद्दोबदल शायद ही होता हो। हर साल सरकार अपना रिपोर्ट कार्ड बढ़ा-चढ़ा कर पेश करती है। विकास के आंकड़े बदलते रहते हैं और ऊपर ही ऊपर भागते रहते हैं, जो चीज नहीं बदलती वह है जनता की समस्या। समस्या बदलने की बजाय बढ़ती रहती है। अपने प्रधानमंत्री जी बड़े अर्थशास्त्री हैं। विडंबना है कि उन्हीं के शासनकाल में जनता महंगाई के बोझ तले पिस रही है। वे महंगाई को रोक पाने में असफल रहने के कारण पद नहीं छोड़ सकते। लेकिन किसी 'युवा' के लिए पद जरूर छोड़ने को तैयार हैं। वे रिटायर होने से पहले 'अधूरा' काम पूरा करना चाहते हैं। बहुतों को यह बात समझ में नहीं आई कि 'युवा' के लिए पद छोड़ने का बाद उनका 'अधूरा' काम पूरा कैसे होगा? शायद प्रधानमंत्री का अधूरा काम 'युवा' के हाथ में कमान देने से ही पूरा होता हो। वे यही 'अधूरा' काम पूरा करना चाहते हैं।

सरकार नक्सल समस्या का कोई कारगर उपाय नहीं ढूढ़ पाई है। सुरक्षा बलों के साथ-साथ नक्सली अब आम लोगों को भी निशान बनाने लगे हैं। सरकार इस समस्या से लड़ने पर आपस में ही भिड़ी और बंटी हुई है। देश में किसानों की आत्महत्या, गरीबों का स्वास्थ्य, पानी और बिजली कोई मसला नहीं है। हमारी सरकार की नजरों में इन सभी की स्थिति बेहतर है! कई पश्चिमी देशों से भी अच्छी! या फिर सरकार ने इन सभी क्षेत्रों की तुलना कभी की ही न हो। यह सांसदों के वेतन का मामला तो है नहीं कि तुलना की जाए कि ब्रिटेन के सांसदों के कितना कम भारतीय सांसद वेतन पाते हैं। अगर मसला है तो वह सिर्फ कुर्सी है। कुर्सी कब छोड़नी है। कुर्सी पर कौन बैठेगा। किसके लिए कुर्सी छोड़नी है। यही सब बड़े लोकतंत्र की निशानी बन गई है।
अपने देश में सरकार के कामकाज का मूल्यांकन का आधार जनता नहीं है। बल्कि कुछ और ही है। तभी जनता की परेशानियों को सरकार तवज्जो नहीं देती! इसलिए लोकतंत्र की परिभाषा में बदलाव जरूरी है। आखिर कुछ तो बदले!

Monday, May 17, 2010

खाना हम खाएं और बदहजमी उसे!

अमेरिका दुनिया के कोने-कोने और हर चीज के लिए चिंतित रहता है। यह उसकी आदत है। दूसरे देशों के लोगों के बारे में सोचने उन्हें सुधारने के चक्कर में वह अपने ही देश के लोगों की नहीं सुनता! उसकी आदत धीरे-धीरे बीमारी का रूप लेती जा रही है। अमेरिका में सरकार जरूर बदलती है लेकिन प्रशासकों की सोच नहीं बदलती। कुल मिलाकर उसकी स्थिति हमेशा 'ईष्यालु पड़ोसी' जैसी रहती है। भारतीयों के बारे में उसका यह रवैया कई बार सामने आ चुका है। लेकिन हमारे प्रशासकों को अमेरिकी वंदना से फुर्सत कहां!

कभी-कभी तो अमेरिका अपनी हदें भी भूल जाता है। हमसे जल-भून अमेरिका हमारे खिलाफ बयानबाजी करता है। हमारा खाना, गाड़ी खरीदना या फिर हमारे सॉफ्टवेयर इंजीनियर उसे कुछ भी पसंद नहीं। खाना अधिक हम खाते हैं लेकिन बदहजमी और खट्टे डकार का शिकार अमेरिका हो जाता है। अमेरिका में अनाज की कमी हो जाती है। वहां लोगों को खाने को नहीं मिलता! सरकार की चूलें हिलने लगती हैं। जनता की नाराजगी से बचने के लिए हताशा में अमेरिका के राष्ट्रपति जॉर्ज बुश हमें कोसने लगते हैं!

ऐसा ही कुछ कार की खरीदारी को लेकर भी है। भारत और चीन में कारों की खपत से बराक ओबामा परेशान हो गए हैं। इसे वे पेट्रोल-डीजल की खपत बढ़ जाने का कारण मानते हैं। उन्हें पहली बार पेट्रोल-डीजल की कमी की आशंका से बेचैनी हो रही है! शायद ओबामा को याद नहीं कि जॉर्ज बुश ने जाते-जाते उन्हें उपहार स्वरूप जो इराकी तेल कुओं की सौगात दी है वह अब भी सुरक्षित है! इसका सदुपयोग कब किया जाएगा? कहीं ऐसा तो नहीं कि अमेरिका ने इराकी तेल कुओं को खाली कर दिया हो! ओबामा इतना भी मूर्ख नहीं हो सकते। जिन तेल कुओं को पाने के लिए बाप-बेटे दोनों ने सैकड़ों सैनिकों की जान की बाजी लगा दी हो उसे पानी की तरह नहीं बहाया जाना चाहिए।

अक्सर गलतियां कई सबक दे जाती हैं। लेकिन अमेरिका को लगता ही नहीं कि उसने कोई गलती की है। चाहे वियतनाम युद्ध हो, सोवियत संघ के खिलाफ अफगानिस्तान के लड़ाकों को मदद या इराक में उसकी कारगुजारी। इसका खामियाजा भी उसे भुगतना पड़ रहा है। एक बार अमेरिका पर हमला हो चुका है और कई हमले के प्रयास विफल किए जा चुके हैं। इन सबके पीछे अमेरिकी मदद से उपजे तत्व ही हैं। एक के बाद एक कई देशों में सैनिक अभियान और लड़ाकों को दाना-पानी देते रहने की उसकी सनक सारी कहानी कहती है। लेकिन वह क्यों संभले वह तो युद्ध करके शांति का पुरस्कार जीत चुका है!