Saturday, March 28, 2009

तीर-तुक्कों के भरोसे

एक सुबह मैंने अपने पड़ोसी वर्मा जी को बोरिया बिस्तर लेकर फ्लैट से निकलते हुए देखा। मुङो थोड़ा आश्चर्य हुआ। मैंने उन्हें टोका- वर्मा जी सुबह-सुबह अचानक कहां चल दिए? उन्होंने बुरा-सा मुंह बनाते हुए कहा-मैं अगले कुछ महीनों के लिए बाहर जा रहा हूं। जवाब सुनकर मुझसे रहा नहीं गया। मैंने पूछा क्यों? ऐसी क्या विपत्ति आ गई? वर्मा जी ने कहा-अखबार-टीवी से तुम्हारा तो छत्तीस का आंकड़ा है। कुछ खबर तो रखते हो नहीं। सुनो- देश में चुनाव होने तक सरकार ने सुरक्षा को लेकर हाथ खड़े कर दिए हैं। इसीलिए तो आईपीएल को भी देश से बाहर कर दिया गया है! मुङो अपनी भाग्यवान और बच्चों की बड़ी फिक्र है, इसलिए मैंने यह फैसला किया।

मैंने शिकायत भरे लहजे में कहा- वर्मा जी, आप बड़े डरपोक किस्म के आदमी हैं! अपनी बीवी और बच्चों के सामने मेरा यह कहना उन्हें अच्छा नहीं लगा। मेरी इस बात पर वर्मा जी बगले झांकने लगे। मैंने बिगड़ती बात को संभालने की कोशिश करते हुए कहा- वर्मा जी, अपनी सरकार न खिलाड़ियों को ‘पप्पूज् नहीं बनने देना चाहती। उन्हें थोड़ी राहत मिली। उन्होंने पूछा-वो कैसे? मैंने उन्हें समझाया- यदि चुनाव और आईपीएल साथ-साथ होते तो क्रिकेटर वोट नहीं दे पाते। ऐसे में क्रिकेटर 'पप्पू' बन जाते कि नहीं! वर्मा जी ने मेरी बात से सहमति जताई।

इसके बाद भी वर्मा जी को शांति नहीं मिली। उन्होंने पूछा आईपीएल को दक्षिण अफ्रीका ही क्यों शिफ्ट किया गया? मैंने कहा यही तो राज की बात है! ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि शाहरुख, शिल्पा और प्रीति तीनों वहीं फिल्मों की शूटिंग कर रहे थे! उनकी सहूलियत के लिए ऐसा किया गया। अब वे शूटिंग के साथ-साथ अपने-अपने टीम के लिए चीयर लीडर्स का काम भी कर सकेंगे! अपने कुछ क्रिकेटरों को भी प्रचार के लिए शूट करना था! बस, हो गया न एक पंथ दो काज! आप तो नाहक ही परेशान हो रहे थे। वर्मा जी को थोड़ा और सुकून मिला।

मैंने वर्मा जी को संयत होते देख कहा कि इसकी एक और वजह है। यह सुनते ही वर्मा जी के माथे पर दोबारा चिंता की लकीरें उभर आईं। मैंने कहा- देश के नुमाइंदों ने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि उन्हें कुर्सी से चिपके रहना कितना अच्छा लगता है! सब अपनी-अपनी कुर्सी बचाने के जुगत में हैं! ऐसे में ध्यान भटकाने वाली चीज को टरका देना ही उचित विकल्प था! क्योंकि एक बार कुर्सी फिसली कि मक्खन के मटके से जुदा हो जाएंगे और इसे बर्दाश्त कर पाने की क्षमता वे मेले में भूल आएं हैं! अब तो नए तीर-तुक्कों का ही सहारा है!

Friday, March 27, 2009

'कौन हारा घाट' पर दिग्गज

बिहार की राजधानी पटना से महज 10 किलोमीटर दूर स्थित हाजीपुर आधुनिक, ऐतिहासिक और पौराणिक चीजों का अनूठा संगम है। यह शहर वैशाली जिले में आता है, जहां लिच्छिवियों ने विश्व का पहला गणतंत्र स्थापित किया था। महात्मा बुद्ध के शिष्य आनंद के अवशेष का एक हिस्सा हाजीपुर में सुरक्षित रखा गया है। हाजीपुर-पटना के बीच एशिया का सबसे बड़ा सड़क पुल महात्मा गांधी सेतु है, जो गंगा नदी पर बनाया गया है। इसकी लंबाई लगभग साढ़े पांच किलोमीटर है। यह पुल उत्तर और दक्षिण बिहार को जोड़ता है। इस शहर को गंडक नदी सारण जिले से अलग करती है। इस तरह यह शहर दो नदियों-गंगा और गंडक के मिलन स्थल पर बसा है। यहीं रेलवे के ईस्ट-सेंट्रल जोन का मुख्यालय है। इन सबसे अलग हाजीपुर केले के लिए भी प्रसिद्ध है।


प्राचीन काल में हाजीपुर का नाम उक्काकला था। यह पटना की ओर से गंगा नदी पार करने के बाद पहला गांव था। इतिहास में इस बात का भी स्पष्ट उल्लेख है कि हाजीपुर में मुगल सम्राट अकबर और बंगाल के उसके व्रिोही अफगान शासक के बीच दो बार वर्ष 1572 और 1574 में युद्ध हुआ था। अंग्रेजों के शासन के समय में हाजीपुर मुजफ्फरपुर जिले का एक छोटा शहर था। इसका वर्तमान नाम इसके संस्थापक हाजी इलियास के नाम पर है।


हाजीपुर के साथ एक किंवदंती भी जुड़ी हुई है। इसके अनुसार एक बार इसके घाट पर गज (हाथी) और ग्राह (मगरमच्छ) के बीच जबर्दस्त लड़ाई कई दिनों तक चलती रही। मान्यता के अनुसार गज भगवान विष्णु का उपासक था। अंत में गज ने अपनी रक्षा के लिए इष्टदेव विष्णु को पुकारा। भक्त की पुकार सुन भगवान विष्णु अवतरित हुए और उन्होंने ग्राह को मार कर अपने भक्त की जान बचाई। यह भी मान्यता है कि गज और ग्राह गंधर्व थे। भगवान विष्णु ने ग्राह को मारकर उसे मुक्ति दी थी। इसके बाद से ही यह घाट 'कौन हारा घाट' के नाम से प्रसिद्ध हो गया।


आजादी के बाद हुए पहले आम चुनाव में यहां से कांग्रेस पार्टी को सफलता मिली। वर्ष 1971 के आम चुनाव तक इस सीट पर कांग्रेस का कब्जा रहा। लेकिन वर्ष 1977 में कांग्रेस विरोध की आंधी में जनता पार्टी के टिकट पर पहली बार रामविलास पासवान ने हाजीपुर संसदीय सीट से जीत दर्ज की। इससे पहले पासवान यूनाइटेड सोशलिस्ट पार्टी के टिकट पर राज्य विधानसभा के सदस्य भी रह चुके थे। इसके बाद वर्ष 1984 में कांग्रेस ने इस सीट पर पुन: कब्जा कर लिया। लेकिन वर्ष 1989 से 2004 के लगातार छह आम चुनावों में पासवान जीत का दीदार करते रहे हैं। पासवान पहली बार नौवीं लोकसभा में वीपी सिंह सरकार में श्रम एवं कल्याण मंत्री बनाए गए। वर्तमान सरकार में भी हाजीपुर के प्रतिनिधि के रूप में पासवान उवर्रक और इस्पात मंत्री हैं। लगातार सातवीं बार जीत के लिए हाजीपुर से पासवान एक बार फिर मैदान में हैं।

Monday, March 23, 2009

माही की उलझन

एकदिवसीय सीरीज जीतने के बाद एक दिन माही का फोन आया। मैं ट्वेंटी-20 सीरीज हारने के बाद ही उससे बात करना चाहता था। लेकिन फिर सोचा कि वनडे के बाद ही बात करना ठीक रहेगा। अभी मैं फोन करने के लिए सोच ही रहा था कि उसी ने याद कर लिया। फोन पर वह बहुत चहक रहा था। मैंने उसे बधाई दी। इसके साथ ही जोड़ा कि चलो अब अगले कुछ सीरीज तक बेफिक्र रहोगे! माही ने धीमे स्वर में हामी भरी।

लेकिन माही की आवाज में पहले वाली खनक नहीं थी। मैंने पूछा-टीम में सब ठीक तो है न? टीम तो ठीक है यार लेकिन मैं ठीक नहीं हूं। मैं चौंक गया! कहीं चोट-ओट तो नहीं लग गई। माही ने इसे खारिज करते हुए कहा-अरे, नहीं। तूने टीवी पर मैच नहीं देखा क्या। मेरा बल्ला यहां नहीं चल पा रहा है, यार। मैंने माही को ढाढ़स बधाया। कहा- बल्ला नहीं चल रहा तो क्या हुआ मैच जीत रहे हो न, बस! वैसे भी तुम्हारे फैन तो हर जगह हैं। इतनी जल्दी तो मोह भंग होने से रहा। अभी टेस्ट तो बाकी है! माही ने कहा फिर भी डर तो लगता है न! मैंने माही से कहा तुमने ये तो सुना ही होगा कि डर गया सो मर गया। इसलिए डर पर ध्यान मत दो। सिर्फ गेम खेलते रहो!

माही रुकने का नाम नहीं ले रहा था। उसके पास बताने के लिए और भी बहुत कुछ था। वह लागातार बोले जा रहा था। इसलिए मैं सवाल नहीं पूछ पा रहा था। बड़ी देर से मेरे मन में खलबली मची थी। बीच में टोकते हुए मैंने अपना सवाल दागा- ट्वेंटी-20 मैच के दौरान तुम इतने उखड़े-उखड़े क्यों लग रहे थे? पहले तो माही ने थोड़ी ना-नुकुर की लेकिन मेरे जोर देने पर कहा-उस दौरान मेरी गर्लफ्रेंड नाराज हो गई थी। इसलिए मैं अपसेट था। ये तो बड़ी अजीब बात है, माही भी गर्लफ्रेंड के नाराज होने से अपसेट हो जाता है। मैंने पूछा- कौन सी वाली गर्लफ्रेंड? इस सवाल का जवाब माही ने यह कहकर टाल दिया कि फोन पर डिटेल नहीं बता सकता! मैं भी इस बात को यहीं छोड़ आगे बढ़ गया।

वापस मैं क्रिकेट पर लौट आया। पूछा टेस्ट मैचों के बारे में क्या सोचा है? माही ने तपाक से कहा व्हाइट वाश कर देंगे कीवियों का! अगले ही पल थोड़ा संभलते हुए उसने कहा यदि सचिन का बल्ला चला तो! मैंने इस बात पर जिरह नहीं की। क्योंकि मैं बातचीत की हैप्पी इंडिंग चाहता था !

Tuesday, March 17, 2009

पांच साल बाद फिर एक सपना


इन दिनों मैं बड़ी उलझन में हूं। क्योंकि आजकल मुङो रात में सपने नहीं आते। इस परेशानी को किसी को बताते हुए शर्म आती है! इसमें कोई कुछ कर भी तो नहीं सकता! सारे सपनों पर आजकल नेताओं और अभिनेताओं ने कब्जा कर लिया है। सपनों का इन लोगों ने कॉपीराइट करा लिया है। इसलिए यह आम आदमी की पहुंच से दूर हो गया है। पहले वाला जमाना तो रहा नहीं कि इसे गोदाम में भर कर रखेंगे। फिल्मों ने सेठ के गोदामों के ताले को तोड़ने का नुस्खा जन-जन तक पहुंचा दिया है! इसलिए सतर्कता बरती जा रही है! विकल्प के तौर पर सपनों का कॉपीराइट करा लिया गया है। अब सपनों पर एकाधिकार है, इनकी मर्जी के बिना कोई सपना नहीं देख सकता!

यदि कोई सपना देखना ही चाहता है तो उसे अनुमति लेनी होगी या फिर वही सपना देखना होगा जो हुक्मरान दिखाएं! जसा ठीक पांच साल पहले भारत चमकने का सपना दिखाया गया था! अब पांच साल बाद फिर एक नया सपना दिखाया जा रहा है। भारत के निर्माण का! यह सपना तो हमें पिछले कई दशकों से दिखाया जा रहा है। लेकिन निर्माण यहां हुआ ही नहीं! हुआ होगा कहीं और! किसी नेता या अभिनेता के यहां! आजकल वैसे भी सपने दिखाने की होड़ मची है। ताजातरीन सपना मायावी नगरी के एक भाई का है। भाई ने धरती पर जन्नत बनाने का सपना देखा है! वाकई लाजवाब सपना है! लेकिन झूठे सपने दिखाने वालों का हश्र तो पता है न। उन्हें सिर्फ इंतजार करना पड़ता है! हम तो यह दुआ करेंगे कि इस बार पिछली बार की कहानी न दुहरायी जाए!

इससे अलग कुछ व्यक्तिगत सपने भी हैं। इन्हीं में से एक है पीएम बनने का सपना! इसके लिए जोड़-तोड़ का खेल भी शुरू हो गया है। एक नए आधार की खोज की जा चुकी है। जाति और धर्म के साथ-साथ क्षेत्रवाद भी कतार में आ चुका है! नया आधार भी कम मारक नहीं है! इन सब के सहारे शिखर पर पहुंचने की कवायद शुरू हो चुकी है। दोस्त दुश्मन और दुश्मन दोस्त बन जाएंगे! कुर्सी पाने की ललक ही कुछ ऐसी होती है। इसके सिवा कुछ सूझता ही नहीं!

लेकिन मेरी उलझन जस की तस है। मेरे सपने पर कब्जा कब तक रहेगा? मेरी आंखें बेख्वाब कब तक रहेंगी? कॉपीराइट का जवाब कोई है भी या नहीं। क्या यूं ही उधार के सपने से काम चलाना होगा!

Sunday, March 15, 2009

पप्पू के पिटारे में और क्या!

पटनायक दूसरे नवीन हैं, जिनसे भाजपा इस समय जली भुनी बैठी है। पहले हैं चुनाव आयुक्त नवीन चावला। पटनायक जब से राजनीति में आए हैं उनकी छवि साफ-सुथरी और काम से काम वाली है। राजग सरकार में वे सबसे शांत और अविघ्नकारी सहयोगी थे। कंधमाल की घटनाओं ने उड़ीसा की तरफ ध्यान खींचा नहीं तो नवीन बाबू अपनी अब पुरानी पड़ती जा रही शांत छवि के सहारे राजकाज चला रहे थे। लेकिन पिछले दिनों जो झटका उन्होंने भाजपा को दिया वह सबको भौंचक्का कर गया। अब सबकी निगाहें उन पर टिक गई हैं।

वैसे नवीन पटनायक को राजनीति विरासत में मिली है। उनके पिता बीजू पटनायक भी उड़ीसा के मुख्यमंत्री रह चुके हैं। माता-पिता के लिए नवीन पप्पू थे। बचपन से ही नवीन पटनायक को अपनी मां से बेहद लगाव था। उनकी पढ़ाई देहरादून के वेल्हम ब्वॉयज स्कूल और दून स्कूल से हुई। स्नातक की पढ़ाई नवीन ने दिल्ली विश्वविद्यालय से पूरी की।

अपने पिता बीजू पटनायक की मौत के बाद नवीन अमेरिका से वापस आए और 11 वीं लोकसभा में अस्का संसदीय क्षेत्र से उप चुनाव जनता दल के टिकट पर जीत कर संसद सदस्य बने। दिसंबर 1997 में नवीन ने जनता दल से अलग होकर बीजू जनता दल के नाम से अपनी पार्टी बनाई और 12 वीं लोकसभा के लिए अस्का संसदीय क्षेत्र से दोबारा चुने गए। वर्ष 2000 में भारतीय जनता पार्टी के समर्थन से नवीन पटनायक उड़ीसा के मुख्यमंत्री बने। अपने साझा प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस के खिलाफ भाजपा और बीजद की नजदीकियां बढ़ीं थीं। नवीन पटनायक इंडियन नेशनल ट्रस्ट फॉर आर्ट एंड कल्चरल हेरिटेज (इंटैक) के संस्थापक सदस्य हैं। राजनीति से अलग नवीन लेखन का कार्य भी करते रहे हैं। उन्होंने तीन किताबें भी लिखी हैं।

बीजद ने वर्ष 1998 के आम चुनाव में नौ सीटों पर जीत दर्ज की थी। तब नवीन पटनायक को खनिज मंत्री बनाया गया था। इसके अगले ही साल वर्ष 1999 में बीजद के सीटों की संख्या बढ़कर दस हो गई। पिछले लोकसभा चुनाव में बीजद ने राज्य की 21 लोकसभा सीटों में से 11 पर जीत दर्ज की। इसके साथ ही बीजद ने वर्ष 2000 और 2004 के उड़ीसा विधानसभा चुनावों में भाजपा के साथ मिलकर बेहतर प्रदर्शन किया और साझा सरकार बनाई। नवीन केंद्र में मंत्री का पद छोड़ राज्य की बागडोर संभाल ली। राज्य में पिछले 11 साल से चल रहे भाजपा-बीजद गठबंधन का अंत लोकसभा और विधानसभा के चुनावों के मद्देनजर सीटों के बंटवारे को लेकर हो गया। यह गठबंधन दो विपरीत विचारधारा वाले दलों का था। लेकिन बीजद के लिए गठबंधन तोड़ना मजबूरी भी हो गया था, क्योंकि पिछले साल अगस्त-सितंबर में राज्य के कंधमाल जिले में ईसाइयों पर हमले से पटनायक सरकार की जमकर किरकिरी हुई थी। ऐसे में नवीन पटनायक जनता के सामने इस संदेश के साथ जाएंगे कि देर से ही सही हम सांप्रदायिकता के खिलाफ हैं। भाजपा के लिए यह एक बड़ा झटका है।

बीजद के इस कदम की वाम दलों ने जमकर प्रशंसा की। ग्यारह साल तक भाजपा के साथ सत्ता का सुख भोगने वाले नवीन आज उन्हें धर्मनिरपेक्षता के पुरोधा नजर आ रहे हैं। बीजद को तीसरे मोर्चे में शामिल करने की पुरजोर कोशिश भी वाम दल कर रहे हैं लेकिन नवीन ने अभी अपना पत्ता नहीं खोला है। अब देखना यह है कि नवीन का भाजपा से संबंध तोड़ने का फैसला कितना फलदायी होता है। उनके आगे क्या कदम होंगे, यह भी आम दिलचस्पी का विषय रहेगा। क्या वे तीसरा मोर्चा के घटक बनेंगे या अपने पत्ते चुनाव परिणाम देखकर ही खोलेंगे?

Tuesday, March 10, 2009

आगे की खुदा जाने

बचपन में राजा और प्रजा की कहानी सुना और पढ़ा करता था। दयालु राजा, क्रूर राजा। प्रजा का भला चाहने वाला राजा। उनकी हाल-चाल जानने के लिए हड्डी भेदने वाली ठंड में भी वेश-भूषा बदल कर महल से निकलने वाला राजा। लेकिन इन कहानियों से जवानी के दिनों में भी पीछा नहीं छूट रहा है। अंतर सिर्फ इतना है कि शासन तंत्र के बदले रूप में राजा कहीं नहीं घूम रहा। उनके युवराज घूम रहे हैं। लेकिन इनका मकसद क्या है।

सहीराम जी से मैंने पूछा। सहीराम ने लंबी सांस अंदर की और कहा- अपने युवराज अब राजा बनना चाहते हैं। उन्हें युवराज की जिंदगी में मजा नहीं आ रहा! युवराज बोर हो चुके हैं! इसलिए वे सबको संदेश देना चाहते हैं कि मुङो हल्के से न लिया जाए। इससे यह भी साफ हो जाएगा कि दूर-दूर तक कोई दूसरा व्यक्ति उनकी राह में न आए। यानी रास्ता एकदम साफ! युवराज के परिवार के कई लोगों ने भी रोड शो किया था। युवराज ने वहीं से सीखा है सब कुछ। आपको तो पता ही होगा कि प्रथम पाठशाला परिवार होता है। युवराज पहले से ही कमर कस कर मैदान में उतरना चाहते हैं! युवराज एक गांव और एक शिवकुमारी को सहायता पहुंचाकर देश को देखना-समझना चाहते हैं। ठीक उसी तरह जिस तरह हांडी के एक चावल को टटोलने पर पूरी हांडी के चावल का हाल पता चल जाता है।हालांकि इसकी शुरुआत दशकों पहले उनके ही परिवार से हुई थी लेकिन अब तक कोई बड़ा परिवर्तन नहीं हुआ। आगे की खुदा जाने। आज मुङो सहीराम जी थोड़े बहके-बहके लग रहे थे फिर भी मैं उनकी हां में हां मिलाता जा रहा था।

मेरे मन में और भी कई प्रश्न उमड़-घुमड़ रहे थे। मैंने सहीराम जी से पूछा- युवराज अपने साथ उस अंग्रेज के क्यों ले गए थे? उन्होंने एक ही सांस में ठंढे पानी का गिलास गटकने के बाद कहा- युवराज हमारी गरीबी का सौदा करना चाहते हैं! मैं अवाक रह गया। गरीबी का भी सौदा किया जा सकता है।सहीराम ने आसान शब्दों में समझाया-वह अंग्रेज भी कल का पीएम है। अगर जरूरत पड़ी तो वह अंग्रेज सहायता करने में पीछे नहीं हटेगा। दोनों मिलकर काम करेंगे इसीलिए तो अभी से ही दोनों गलबहियां डाले घूम रहे हैं।

मुङो अब धीरे-धीरे यकीन होने लगा था कि युवराज पूरी तरह पीएम बनने के मूड में हैं! और उनकी तैयारी के तो क्या कहने!


-आज समाज में 22 जनवरी को प्रकाशित.

Monday, March 9, 2009

फन के लिए सब जायज - व्यंग्य

श्रीराम सेना की करतूतों के बारे में जानकर मेरे मित्रों का एक झुंड उदास रहने लगा है। वे अब पब में जाने से डरने लगे हैं! पब चलाने वालों पर भी आफत आ गई है। मित्रों को डर है कि उनकी तथाकथित प्रेमिकाएं एक-एक कर दूर हो जाएंगी और उन्हें फिर वही स्टिरीयोटाइप जिंदगी जीने को मजबूर होना पड़ेगा। जहां न आजादी है और न फन ही! अब फन को हरेक व्यक्ति अपने-अपने तरीके से परिभाषित करेगा। ऐसा करने को वे पूरी तरह आजाद हैं! और आजादी को पूरी तरह इस्तेमाल में लाने से रोकने का हक किसी को नहीं।

चाहे हम अपनी आजादी का उपयोग किसी भी तरह से करें। किसी का घर जलाएं या किसी की दुनिया उजाड़ें। यह हम पर निर्भर करता है! इससे किसी पर क्या प्रभाव पड़ता है, कौन सोचे! यदि हम दूसरों के नजरिए से ही देखें तो यह कैसी आजादी! इसलिए हमें मुहावरे में भी बदलाव करना चाहिए। और नया मुहावरा कुछ इस तरह का होगा फन के लिए सबकुछ जायज है!

मेरे दोस्तों का दूसरा झुंड खुश है। न जाने कितनी लक्ष्मण रेखाएं खींच दी गईं थीं उनके रास्तों में। उनकी शादी में सालों से अड़चनें थीं। कलयुग में रावण बनने में कोई परेशानी तो नहीं लेकिन रिस्क तो है ही। लेकिन वे रिस्क भी लेना नहीं चाहते! मैंने कितना समझाया। कई धांसू टिप्स दिए! लेकिन सब बेकार! अब वे सब टाइमपास के लिए मनपसंद जोड़ीदार की तलाश में हैं! उनकी योजना जोड़ीदार के साथ पबों के आसपास मंडराने की है। जोड़ीदार के नखरे के बाद अगर एक-दो बार पब के अंदर जाना भी पड़े तो यह महंगा सौदा नहीं। शादी तो अपने आप ही करा दी जाएगी! वैसे हम सेना के नाम से हम यूं ही डरे रहते हैं। चाहे वह राम सेना हो या शिव सेना!पबों के मालिकों ने डर से अपनी दुकानों को समेटना शुरू कर दिया है। इसकी जगह वे अब म्यूजिक सिस्टम बेचने की दुकान खोल कर बैठना ज्यादा फायदेमंद समझ रहे हैं।

मेरे दोस्तों का पहला झुंड इसका बड़ा खरीदार है। लेकिन यह उनको फन देने वाला नहीं है। इसके कई खतरे भी हैं! वे हमेशा काजल की कोठरी से बेदाग निकलने का दावा करते रहे हैं। कोई यकीन करे या न करे। कभी-कभी तो उनके हाल पर दया भी आती है। लेकिन मुङो एक बात की खुशी है कि मैं ऐसे किसी पचड़े में पड़ने से बच गया, शायद!

- 10 फरवरी को आज समाज में प्रकाशित .

Sunday, March 8, 2009

कितने अनोखे रंग- अंतिम

ज्यों-ज्यों उम्र बढ़ी त्योहारों से बेरुखी बढ़ती गई। इसका एक कारण घर से दूरी भी हो सकती है। लेकिन घर पर भी जब रहा तो पहले वाला उत्साह कहीं गायब हो गया। वो उमंग नहीं रहा। न लोगों से मिलने जुलने में न ही रंग-गुलाल लगाने में। शायद आसपास के लोगों के अंदर के चेहरे को पहचानने लगा था। झूठी हंसी और अपनापन सब जसे शीशे में उतर आया हो।

कभी त्योहारों का इंतजार करते-करते वक्त बीतता था। अब होली या दीपावली आसपास के लोगों को देखने के बाद ही इनका पता चलता है। मुहल्ले वालों के शोर और पकवानों की खुशबू ही त्योहारों के हमारे प्रतीक बनकर रह गए हैं। सबकुछ जसे पीछे छूट गया। रंग-गुलाल, पिचकारी, शरारत और पकवान! पहली बार जब होली के दिन मैं घर से बाहर था तो रोना आ गया था। धीरे-धीरे सब सामान्य हो गया। साल दर साल एक ही चीज होने से आदत सी पड़ गई है। अब तो कुछ असर ही नहीं पड़ता। 365 दिन एक जसे लगते हैं। किसी खास दिन का इंतजार नहीं रहता। कितने क्रूर हो जाते हैं हम। उम्र बढ़ने के साथ-साथ। क्यों होता है ऐसा?

लाख कोशिशों के बाद इसका उत्तर नहीं मिला। आखिर पूछता भी किससे मैं इसके बारे में। सब तो झूठे हैं। झूठी हंसी लिए फिरते रहते हैं कि कोई भी धोखा खा जाए। दूर से देखकर पहचान करना मुश्किल ही नहीं असंभव। लेकिन नजदीक आने पर सब पता चल जाता है। कुछ भी छुप नहीं सकता। चाहे कोई लाख कोशिश कर ले। अंदर कितना भी गहरा राज हो चेहरे पर नुमायां हो ही जाता है। चाहे अनचाहे। अब सोचता हूं परखने की समझ आना भी बेकार ही था।

कभी-कभी सोचता हूं बच्चे बना रहना ही ठीक था। कुछ भी पता नहीं चलता था। न कुछ देखता था न देखने की ख्वाहिश ही थी। एक छोटी-सी दुनिया थी उसी में मस्त थे। दुनिया के किसी रंग की पहचान नहीं थी। बड़ी खूबसूरत थी वो जिंदगानी। अब चाह कर भी बीते दिन नहीं लौट सकते। सिर्फ उसकी यादें जेहन में रची-बसी हैं। और वे हमेशा रहेंगी। एक सुखद सपने की तरह। बचपन के मित्रों से पुरानी यादों को बांटकर थोड़ी देर के लिए ही सही बच्चा बन जाना ही एक विकल्प बचा है। बस इसे ही पाकर खुश हो लिया जाए। और उसकी रंग-बिरंगे पल को महसूस कर लिया जाए। कहीं ऐसा न हो कि ये यादें भी साथ छोड़ दें और कुछ न बचे!

Saturday, March 7, 2009

कितने अनोखे रंग-1



बचपन में हर त्योहार का इंतजार रहता था। होली, दुर्गा पूजा, दीपावाली और छठ। ये कुछ महत्वपूर्ण और बड़े त्योहार थे। इसके अलावा कुछ अन्य छोटे त्योहार भी थे। हमारा पूरा साल एक के बाद एक त्योहारों का इंतजार करते बीत जाता था। तब ये लगता था कि दो पर्वों के बीच न जाने कितने सालों का अंतर होता है। 365 दिन हमारे लिए 365 साल के बराबर हुआ करते थे।


होली का इंतजार वसंत पंचमी के बाद से ही शुरू हो जाता था। हम होली के 20-25 दिन पहले से ही केले का रस इकट्ठा करना शुरू कर देते थे। घर वालों से छुपकर। यह मान्यता थी कि रंग के घोल में इसे मिलाने से कपड़े से रंग नहीं जाएगा। चाहे कपड़े की कितनी भी धुलाई क्यों न की जाए। होली पर नए कपड़े और रंग-बिरंगी पिचकारी खरीदे जाने पर बहुत खुशी होती थी। महीनों पहले से ही इन सब चीजों की लिस्ट तैयार कर लेते थे। और आश्वसान भी चाहते थे कि हमें ये चीजें दिला दी जाएंगी। ये पता नहीं था कि बिना लिस्ट बनाए और जिद किए भी ये सारी चीजें हमारे पास होंगी। इन छोटी-छोटी चीजों के मिलने से कितनी खुशी होती थी! न कोई फिक्र न डर।


होली के दिन सुबह से रंग घोल के हम तैयार हो जाते थे। रंग डालने की शुरुआत घर के सदस्यों से ही होती थी। पिचकारी का एक विकल्प भी था। कच्चे आलू को दो भागों बांट उसके अंदर वाले हिस्से को खुरेच चोर और 420 लिखवाते थे। ये काम हमारे भईया किया करते थे। लेकिन उस वक्त ये समझ नहीं आता था कि आलू पर चोर और 420 तो उल्टा लिखते हैं लेकिन रंग में डुबोकर जब किसी की पीठ पर ठप्पा लगाते हैं तो सीधा कैसे छप जाता है? कितने बेवकूफ थे हम बचपन में! घंटों रंग खेलते लेकिन मन नहीं भरता था। जब माई या बाबू जी नहाने के लिए कहते तो हम चाहते कि थोड़ा और रंग खेलने को मिले!


होली की बात हो और खाने का जिक्र छोड़ दें तो मजा नहीं आएगा। कई किस्मों के पकवान से वातावरण दमकता रहता था। इसमें दही के साथ कचौड़ी खाना लाजवाब अनुभव देता था। आलू दम में कटहल मिला हो तो वो चिकन से तनिक भी नहीं लगता। हमारे पड़ोसी हमें चिकन और मटन की दावत पर बुलाते और हम छककर खाते।

Wednesday, March 4, 2009

बेढब लाल का प्यार

मेरे मित्र बेढब लाल पहली बार किसी के मोहब्बत में गिरे। वो भी औंधे मुंह! इसके बाद तो किसी के गिरने की आवाज़ भर से वे घायल होने लगे! हर हफ्ते उनके शरीर के अलग-अलग हिस्सों पर लगे जख्म नई कहानी बयां करते! जिन लोगों को उन्होंने अपने गिरने की खबर दी उन्होंने भी उनके जख्मों को कुरेद-कुरेद कर नासूर बना डाला! अब करते भी क्या! लोगों पर वश थोड़े ही न चलता है। इस बीमारी में ऐसा भी होता है कि खुद पर ही कुछ इख्तियार नहीं रहता। यदि इख्तियार होता तो बेढब लाल पहले तो गिरते ही नहीं! रोक लेते खुद को! इसे भी जाने दीजिए। गिरे तो गिरे। उनकी चलती तो औंधे मुंह नहीं गिरते! काबू में कर लेते सारी चीजों को! लेकिन बेढब लाल ऐसा नहीं कर सके बेचारे!

बेढब जी एक बार फिसले तो फिसलते चले गए। मेरे मित्र को पता ही नहीं चला कि कितना ढलान है। लुढ़कते-लुढ़कते गड्ढे में जा गिरे। संयोग से वह उनके मोहल्ले का गटर नहीं था। लेकिन था कुछ वैसा ही! उसकी गहराई से उन्होंने अंदाजा लगाया कि कहीं यह मेरियाना गर्त तो नहीं! गनीमत है गिरने के बाद भी कम से कम अंदाजा लगाने के काबिल तो बचे! अपनी इस हालत के लिए जिम्मेदार भी वही थे। सिकुटी-सिकुटी टांगों और पिचके गालों पर कौन रीझता भला! मगर उन्हें तो इसी पर गर्व था। इसी के गुमान में रह गए! और हुआ वही जो होना था।

बेढब लाल जी को इस बात का इल्म नहीं था कि नए दौर में नए प्रतिमान स्थापित हो चुके हैं। किसी को रिझाने के लिए अंदर की चीजों की बजाए बाहरी चीजों की जरूरत है। मसलन पर्स का मोटा होना, एक अदद बाइक और कठपुतली बन जाना! बेढब लाल के पास इनमें से कुछ चीजें थीं और कुछ नहीं भी। जो चीजें नहीं थीं उसकी कीमत तो चुकानी ही थी। दूसरी ओर आजकल शाहरुख और शाहिद डिमांड में हैं। सब शाहरुख और शाहिद तो नहीं बन सकते लेकिन उनके जसा होने की एक्टिंग तो कर ही सकते हैं! बेढब लाल एक्टिंग करने में पीछे रह गए! ऐसे में मजनूं बनकर फिरते रहने से कुछ हासिल होने से रहा। सच्चाई यह भी है कि पुरानी किस्म की लैला तो लुप्त हो चुकी हैं !अब भला मिलें भी तो कैसे!

असफलता से आहत मेरे अजीज अब सतर्क हो गए हैं। जलवा देखकर फिसलने के प्रबल विरोधी! हर चमकने वाली चीज को सोना समझने की भूल उन्हें बहुत कुछ सीखा चुकी है।

दिल्ली से छपने वाले हिंदी दैनिक आज समाज में 18 फ़रवरी को प्रकाशित.

Tuesday, March 3, 2009

ऑस्कर के लिए जुगाड़

ऑस्कर का बुखार उतरने के साथ ही मेरे मन में नई तरह की उम्मीदें अंगड़ाइयां लेने लगी हैं। कई तरह के नए सपने हिलोरे मार रहे हैं। मन पर लगाम लगाना तो असंभव ठहरा न! अब नई आकांक्षाओं और उम्मीदों को कौन रोक सकता है भला! मन ने कहा-स्लमडॉग की विषय वस्तु और ऑस्कर पुरस्कार जीतने के बाद अब भारत के स्लम और वहां रहने वालों के दिन भी बदल जाएंगे! स्लम वाले लोग भी आलीशान बंगले में रहेंगे! प्लास्टिक से बने घेरे जिसे वे घर कहते हैं बीते दिनों की बात हो जाएगी। बिजली और पानी मुफ्त में दी जाएगी सो अलग!

ऑस्कर मिलने के बाद यह विषय हॉट हो गया है। इस विषय को अलग-अलग नाम और किरदार लेकर दर्जनों फिल्में बनेंगी। इस बार एक्टर के साथ-साथ डायरेक्टर भी अपना होगा। फिल्म के विषय और डायरेक्टर के देसी होने से देसी स्लमडॉग बनेगा। खालिस मुंबइया! मिलावट से रहित। सौ फीसदी शुद्ध स्लमडॉग! बिना यह विचार किए कि किसी देसी फिल्म को ऑस्कर मिलेगा या नहीं। न मिले तो कोई बात नहीं। यदि मिलता है तो खुशी दोगुनी हो जाएगी। इसका मतलब यह नहीं लगाना चाहिए कि स्लमडॉग को मिले ऑस्कर से हम खुश नहीं। वैसे भी बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना को चरितार्थ करने में हम हमेशा से ही आगे रहे हैं!

इधर हमारी सरकार भी कम नहीं उछल रही है! सुना है कि इसी खुशी में चूर उसने इसके लिए एक नए मंत्रालय का गठन करने फैसला किया है! हम तो पहले ही से जानते थे कि पुरस्कार वगैरह जुगाड़ से ही मिला करते हैं। सरकार ने घोषणा करने में इतना समय क्यों लगाया! हर साल हमसे ज्यादा शायद ही कहीं फिल्म बनाई जाती हो। इसलिए हमारे लिए तो हर साल पुरस्कार पाने के अच्छे मौके हैं। अगर सरकार ने यह कदम पहले उठाया होता तो हमें लाभ मिलता! सरकार के इस ढुलमुल रवैये से देश को भारी नुकसान पहुंचा है! खासकर हमारे सिनेमा जगत को। हमें विश्व स्तर पर पहचान नहीं मिली! जो मिली है वह आधी-अधूरी है।हम संतोषी प्राणी भी तो ठहरे! जितना मिल गया उसी से खुश रहने की बीमारी है। लेकिन ऐसा होने से लोग कहते हैं कि विकास रुक जाता है। यानी विकास के लिए लालची होना जरूरी है! इसलिए देसी ऑस्कर की आस लिए हमें स्लम की ओर कूच करना चाहिए, जहां उसकी जड़ है। वैसे भी बुजुर्गो ने कहा है कि शुभ काम की शुरुआत मत्था टेकने से करनी चाहिए।

दिल्ली से छपने वाले हिंदी दैनिक आज समाज में 03 मार्च को प्रकाशित.

Monday, March 2, 2009

मैं और आईआईएमसी- अंतिम


इस बात की आलोचनाओं के बावजूद मुङो आईआईएमसी में न पढ़ पाने का मलाल है। लेकिन पिछले तीन सालों में मैं इस बात से भलीभांति परिचित हो चुका हूं कि सिर्फ संस्थान किसी को सफल पत्रकार नहीं बना सकता। हां, यह बात बिलकुल सही है कि बढ़िया संस्थान अच्छा प्लेटफॉर्म दिलाने में मदद करता है। यहां सारा खेल जुगाड़ का है। यदि जुगाड़ मजबूत है तो अच्छे संस्थान में बढ़िया पैकेज से आपको कोई रोक नहीं सकता। यहां योग्यता द्वितीयक हो जाती है।

इस छोटी सी अवधि में आईआईएमसी से पढ़े कई लोग मिले। लेकिन संस्थान की कहीं अलग छाप नहीं दिखी। इतना जरूर है कि जितने लोग मिले उसमें से अधिकांश आत्ममुग्ध निकले। उनके दिमाग में यह बात हमेशा चलती रहती है कि मैंने अच्छे संस्थान में पढ़ाई की है तो मैं ही बेस्ट हूं। हालांकि यह व्यक्ति विशेष का व्यक्तिगत गुण भी हो सकता है। कुछ ऐसे भी हैं, जो इनसे बिलकुल अलग हैं। उन्होंने कभी यह नहीं जताया कि उन्होंने कहां से पत्रकारिता की पढ़ाई की है। यहां इस बात का जिक्र करना भी आवश्यक है कि कई ऐसे लोग भी मिले जिनसे मिलकर लगा कि इन्हें कैसे प्रवेश मिल गया। यह बात मेरे समझ से बिलकुल परे थी। ऐसे लोगों से संस्थान की छवि को नुकसान ही पहुंचता है।
एक और वाकया याद आता है। जब मैं दूसरी बार प्रवेश के लिए साक्षात्कार देने गया था। वहां एक उम्मीदवार को-जो कथित तौर पर हस्तरेखाओं की जानकारी रखता था-साक्षात्कार कक्ष से बाहर आने के बाद दोबारा बुलाकर हाथ देखने के एवज में तत्कालीन पाठ्यक्रम संयोजक ने 101 रुपए दक्षिणास्वरूप दिए। बाद में पता चला कि उसे प्रवेश भी मिल गया है। ऐसे कई उदाहरण हो सकते हैं, जिन पर पर्दा पड़ा हुआ है। यह महज एक संयोग भी हो सकता है।
मजबूत जुगाड़ नहीं होने पर बस एक ही रास्ता बचता है। वह है संघर्ष का रास्ता। यह विकल्प कांटों भरा तो है लेकिन इसका कोई साइड इफेक्ट नहीं होता। मैं बहुत सारे ऐसे लोगों को जानता हूं, जिन्होंने संपादक के नाम चिट्ठी लिखकर पत्रकार बनने की राह तय की। इसमें आज के कई नामी गिरामी पत्रकार शामिल हैं।