यह जंग किसी भी अन्य लड़ाई से तनिक भी कम नहीं है। इसकी तुलना मियां-बीवी,चूहा-बिल्ली या प्रेमी-प्रेमिकाओं के झगड़ों से किया जा सकता है। हालांकि दोनों में खूब छनती है। दोनों का चोली-दामन का साथ है। लेकिन अखबार और टीवी चैनल अपनी लड़ाई को अनोखी, अतुलनीय तथा बिल्कुल अलग मानते हैं!अखबार और टीवी चैनल में काम करने वालों को भी एक दूसरे से उन्नीस होना स्वीकार्य नहीं है! इनके झगड़े के कई रूप हैं लेकिन उसकी चर्चा फिर कभी। आज तो सिर्फ
अखबार और चैनल के झगड़ों की आंखों देखी प्रस्तुत कर रहा हूं-
एक बार चैनल ने अखबार से कहा कि मैं पल भर में लोगों तक पहुंच जाता हूं। तुम्हारी तरह बासी खबरों से सुबह-सुबह लोगों को बोर नहीं करता! दृश्य माध्यम होने के कारण चैनल को खुद पर मानो गुमान हो। अखबार भला कैसे चुप रहता। उसने जवाब दिया कि पल-पल का पहुंचने का दम भरते हो हमारी ही बदौलत। इसमें आधे ज्यादा तो हमारा ही योगदान रहता है। हम
न हों तो तुम्हें भी आटे-दाल का भाव पता चल जाएगा। भूत-प्रेत से लेकर कुत्ता, बिल्ली और चूहा तक को खबर बना देते हो! इसीलिए तो तुम्हारी दिखाई हुई खबरों को कोई गंभीरता से नहीं लेता। चैनल थोड़ा-सा सकपका गया! शायद उसे इतनी कड़वी प्रतिक्रिया की उम्मीद न थी।
चैनल ने धाक जमाने के लिए अपने दूसरे अस्त्र का प्रयोग किया। कहा-हम खबर के साथ-साथ विजुअल्स भी पेश करते हैं। इसलिए हमारी खबर ज्यादा वजनदार हो जाती है। अखबार ने कहा कि विजुअल्स वाली बात तो तुम्हारी ठीक है लेकिन इसमें खबरें रहती कहां हैं। रात में प्रसारित टीवी के रियलटी शोज को सुबह तड़का मारकर पेश करते हो और उसी को वजनदार बताते हो! हां, तुम्हारे विजुअल्स में जान होती है! वे किसी भी विश्वामित्र को विचलित कर सकते हैं! मैं तो कहता हूं कि ये एक साथ कई विश्वामित्रों की वर्षो की तपस्या को पलक झपकते ही भंग कर सकते हैं। घर में टीवी रखने वालों को तो एक साथ ही कई फायदे मिल जाते हैं! चैनल ने भी नहले पर दहला मारा-तुम भी तस्वीरों के जरिए हलचल मचाने में पीछे थोड़े ही न हो! ऐसी-ऐसी तस्वीरें छापते हो कि लाज भी ङोंप जाए!
दोनों के बीच देर तक आरोप-प्रत्यारोप का दौर चलता रहा। लेकिन हार-जीत का फैसला नहीं हो सका। अंत में दोनों इस बात पर सहमत हो गए वर्तमान समय में दोनों ही संक्रमण काल से गुजर रहे हैं। कमोबेश दोनों की हालत भी एक जसी है। अब राई और सरसों में किसको सराहा जाए!
Friday, June 26, 2009
Saturday, June 20, 2009
कुछ अनकही और अनसुनी बातें
टी-20 विश्व कप से बाहर हो जाने के बाद टीम इंडिया के कप्तान रक्षात्मक मूड में थे। यह रवैया ठीक उसी तरह का था जिस तरह पिछले कुछ दिनों से उनकी बल्लेबाजी रही है। वे चाहते थे कि प्रेस कांफ्रेंस में किसी और को भेजकर काम चला लिया जाए। लेकिन टीम से कोई और पत्रकारों के सवालों को जवाब देने को तैयार नहीं था। माही को कप्तान बनने के बाद पहली बार प्रेस कांफ्रेंस में जाने में हिचकिचाहट हो रही थी। लेकिन संकट में फंसे कप्तान को बचाने के लिए कोई आगे नहीं आया। माही अंदर ही अंदर कसमसाकर रह गए थे।
प्रेस क्रांफ्रेंस में माही ने क्रिकेट प्रेमियों से माफी मांग ली है। आशा है लोग उन्हें माफ कर देंगे! लेकिन टीम की हार के लिए माही को दोषी नहीं ठहराना चाहिए। उनको टीम कैसी दी गई थी! क्रिकेट के खुदा ने पहले ही ट्वेंटी-20 न खेलने की घोषणा कर चुके थे। ये अलग बात है कि उन्हें क्रिकेट के इस फॉर्मेट से घृणा नहीं है। आखिर वे आईपीएल की एक टीम के कप्तान हैं। यह माही की टीम को सबक सिखाने के लिए था। जरूर ड्रेसिंग रूम में माही ने उल्टी-सीधी बात कही होगी। मास्टर ब्लास्टर का गुस्सा होना लाजमी भी था। लेकिन यह सब तो चलता ही रहता है!
विश्व कप में माही को कमजोर टीम भी मिली थी! मास्टर ब्लास्टर को बोर्ड और कुछ पुराने खिलाड़ियों ने ट्वेंटी-20 खेलने के लिए बहुत मनाया। ताकि टीम की कमजोरी को दूर किया जा सके। टीम में जोश भरा जा सके (मास्टर ब्लास्टर की उम्र पर जाने की जरूरत नहीं)! लेकिन वे नहीं माने। मास्टर ब्लास्ट के साथ अंत में इस बात पर समझौता हुआ कि वे बस लॉर्डस की बालकनी तक ही जाएंगे! अफसोस, उनकी बालकनी में उपस्थिति भी टीम को सेमीफाइनल में नहीं पहुंचा सकी! इससे माही बेहद खफा थे और उसने उसी रात कह दिया कि मास्टर ब्लास्टर की अगले दौरे में जरूरत नहीं है! बोर्ड ने भी इस पर अनफिट होने का सदाबहार बहाने का खोल डाल दिया है!
माही ने आगे के मैचों के लिए टीम में बड़े बदलाव की वकालत की है। आईपीएल की तरह ही भारतीय टीम में कुछ विदेशी खिलाड़ियों को शामिल करने का विनम्र अनुरोध बोर्ड से किया है! ताकि टीम जीतती रहे। टीम की जीत से ही तो कप्तान चमकता है! आखिर विज्ञापनवालों को बांध कर रखना भी तो है!
प्रेस क्रांफ्रेंस में माही ने क्रिकेट प्रेमियों से माफी मांग ली है। आशा है लोग उन्हें माफ कर देंगे! लेकिन टीम की हार के लिए माही को दोषी नहीं ठहराना चाहिए। उनको टीम कैसी दी गई थी! क्रिकेट के खुदा ने पहले ही ट्वेंटी-20 न खेलने की घोषणा कर चुके थे। ये अलग बात है कि उन्हें क्रिकेट के इस फॉर्मेट से घृणा नहीं है। आखिर वे आईपीएल की एक टीम के कप्तान हैं। यह माही की टीम को सबक सिखाने के लिए था। जरूर ड्रेसिंग रूम में माही ने उल्टी-सीधी बात कही होगी। मास्टर ब्लास्टर का गुस्सा होना लाजमी भी था। लेकिन यह सब तो चलता ही रहता है!
विश्व कप में माही को कमजोर टीम भी मिली थी! मास्टर ब्लास्टर को बोर्ड और कुछ पुराने खिलाड़ियों ने ट्वेंटी-20 खेलने के लिए बहुत मनाया। ताकि टीम की कमजोरी को दूर किया जा सके। टीम में जोश भरा जा सके (मास्टर ब्लास्टर की उम्र पर जाने की जरूरत नहीं)! लेकिन वे नहीं माने। मास्टर ब्लास्ट के साथ अंत में इस बात पर समझौता हुआ कि वे बस लॉर्डस की बालकनी तक ही जाएंगे! अफसोस, उनकी बालकनी में उपस्थिति भी टीम को सेमीफाइनल में नहीं पहुंचा सकी! इससे माही बेहद खफा थे और उसने उसी रात कह दिया कि मास्टर ब्लास्टर की अगले दौरे में जरूरत नहीं है! बोर्ड ने भी इस पर अनफिट होने का सदाबहार बहाने का खोल डाल दिया है!
माही ने आगे के मैचों के लिए टीम में बड़े बदलाव की वकालत की है। आईपीएल की तरह ही भारतीय टीम में कुछ विदेशी खिलाड़ियों को शामिल करने का विनम्र अनुरोध बोर्ड से किया है! ताकि टीम जीतती रहे। टीम की जीत से ही तो कप्तान चमकता है! आखिर विज्ञापनवालों को बांध कर रखना भी तो है!
Wednesday, June 10, 2009
नये जमाने में प्रेम
मेरे एक पड़ोसी के मित्र चंपूलाल जी इन दिनों बड़े परेशान चल रहे थे। यह बात मैं पहली ही नजर में भांप गया था। उनका सदाबहार हंसता-मुस्कुराता चेहरा सूख गया था। ठीक उसी तरह जसे हमारे गांव की नदी गर्मियों में हो जाती है! मैंने एक दिन चंपूलाल जी से इसका कारण पूछ ही बैठा। मैं सब कुछ उनके मुंह से सुनना चाहता था। उन्होंने थोड़ा सकुचाते हुए अपनी जवानी को परेशानी का कारण बताया! लेकिन मुङो उनका यह कारण टालू लगा। इसलिए मैंने कुरेदना जारी रखा।
चंपूलालजी का सब्र का बांध भावनाओं में भड़भड़ा के बह निकला। बेचारे सचमुच जवानी के दिनों की बीमारी का ही शिकार हुए थे! मुङो उन पर तरस और खुद पर ग्लानि हुई। मैं नाहक ही बेचारे पर शक कर रहा था। हुआ यह था कि अपने चंपू भाई का दिल पड़ोस में रहने वाली एक लड़की पर आकर अटक गया था। लड़की चंपूलाल जी को कभी-कभार फोन करके मिलने के लिए बुलाती। चंपूलाल जी जोश से लबरेज हिरन की तरह कुलांचे भरते पहुंच जाते। रास्ते भर बातचीत का मसौदा तय करते जाते। घंटों इधर-उधर की बातें होतीं लेकिन उनका मसौदा तरकश में ही जमा रह जाता। क्षणिक साथ पाकर उन्हें कुछ याद ही नहीं रहता! ऐसे ही दिन, महीने और साल बीत गए। मगर चंपू भाई को कुछ हासिल न हुआ!
इस तरह रोज-रोज अघोषित प्रेम में गोता लगाते-लगाते चंपूलाल जी ऊब गए थे। वे इस रहस्य से जल्द से जल्द पर्दा उठाने के लिए बेताब थे। इसके लिए उन्होंने हाथ-पांव मारना भी चालू कर दिया। इस बार उन्होंने लड़की को मिलने को बुलाया। लेकिन हमेशा की तरह उन्होंने कोई मसौदा तैयार नहीं किया। उन्होंने सीधे-सीधे अपनी दिल की बात लड़की के सामने रख दी। उन्हें पूरा विश्वास था कि उनके प्यार पर अमिट मुहर लग जाएगी। लेकिन लड़की के कहा कि बिना प्यार के जसा चल रहा है वही ठीक है। चंपूलाल जी यह सुनकर उदास रहने लगे।
मैंने उन्हें समझाया-चंपू भाई, जवानी के दिनों के ये किस्से तो सबके साथ होते हैं। आपके साथ ऐसा कुछ न होता तो परेशानी की बात थी। आप खुद को खुशकिस्मत मानिए कि नये जमाने के प्रेम का अनुभव आपके पास है और यह बहुत बड़ी बात है!
चंपूलालजी का सब्र का बांध भावनाओं में भड़भड़ा के बह निकला। बेचारे सचमुच जवानी के दिनों की बीमारी का ही शिकार हुए थे! मुङो उन पर तरस और खुद पर ग्लानि हुई। मैं नाहक ही बेचारे पर शक कर रहा था। हुआ यह था कि अपने चंपू भाई का दिल पड़ोस में रहने वाली एक लड़की पर आकर अटक गया था। लड़की चंपूलाल जी को कभी-कभार फोन करके मिलने के लिए बुलाती। चंपूलाल जी जोश से लबरेज हिरन की तरह कुलांचे भरते पहुंच जाते। रास्ते भर बातचीत का मसौदा तय करते जाते। घंटों इधर-उधर की बातें होतीं लेकिन उनका मसौदा तरकश में ही जमा रह जाता। क्षणिक साथ पाकर उन्हें कुछ याद ही नहीं रहता! ऐसे ही दिन, महीने और साल बीत गए। मगर चंपू भाई को कुछ हासिल न हुआ!
इस तरह रोज-रोज अघोषित प्रेम में गोता लगाते-लगाते चंपूलाल जी ऊब गए थे। वे इस रहस्य से जल्द से जल्द पर्दा उठाने के लिए बेताब थे। इसके लिए उन्होंने हाथ-पांव मारना भी चालू कर दिया। इस बार उन्होंने लड़की को मिलने को बुलाया। लेकिन हमेशा की तरह उन्होंने कोई मसौदा तैयार नहीं किया। उन्होंने सीधे-सीधे अपनी दिल की बात लड़की के सामने रख दी। उन्हें पूरा विश्वास था कि उनके प्यार पर अमिट मुहर लग जाएगी। लेकिन लड़की के कहा कि बिना प्यार के जसा चल रहा है वही ठीक है। चंपूलाल जी यह सुनकर उदास रहने लगे।
मैंने उन्हें समझाया-चंपू भाई, जवानी के दिनों के ये किस्से तो सबके साथ होते हैं। आपके साथ ऐसा कुछ न होता तो परेशानी की बात थी। आप खुद को खुशकिस्मत मानिए कि नये जमाने के प्रेम का अनुभव आपके पास है और यह बहुत बड़ी बात है!
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