कई बार मुझे लगता है कि नौकरी मिलने के बाद जिंदगी का एक चैप्टर बंद तो होता है, लेकिन दूसरा शुरू भी हो जाता है। एक व्यक्ति को कई नई चुनौतियों से दो-चार होना पड़ता है। इसी में से एक है- शादी। शादी करने से पहले लड़का-लड़की की हालत एग्जाम देने जा रहे किसी स्टूडेंट की तरह रहती है। चाहे कितनी भी तैयारी हो उसे यह नहीं लगता कि पेपर अच्छे से कर पाएगा या खूब नंबर ला पाएगा। हमारे यहां शादियों में अगुआ (ऐसा व्यक्ति जो वर और वधू दोनों पक्षों को जानता है और शादी का प्रस्ताव लेकर सबसे पहले वही आता है) की अहम भूमिका रहती है।
समय के साथ-साथ शादियों में नए-नए अगुओं का चलन आ गया है। संचार क्रांति के युग में मैट्रिमनी साइट को किसी भी मायने में कमजोर अगुआ नहीं माना जा सकता। ऐसे ही एक दिन नेट सर्फिंग करते-करते मैं मैट्रिमनी साइट पर जा पहुंचा। इससे पहले तक मैं शादियों में सिर्फ लड़कों की पसंद के बारे में ही जानता था। लेकिन इस साइट पर मुझे लड़कियां कहीं से भी लड़कों से उन्नीस नहीं दिखीं। लड़कों की उम्र, कद-काठी से लेकर इनकम वगैरह की एक लंबी-चौड़ी लिस्ट थी। एक दो उदारवादी प्रोफाइल को छोड़ अधिकतर को मोटी तनख्वाह कमाने वाले पति की तलाश थी। पढ़ाई कर रही लड़की और उनके पैरंट्स ही प्रोफाइल से थोड़े उदार दिखे। जॉब कर रही लड़कियों को अपने से 3-4 गुनी अधिक सैलरी पाने वाला लड़का चाहिए था। हालांकि, लड़कों के पेशे के बारे में दोनों ही वर्गों के विचार एक जैसे थे।
लड़कियों और उनके परिवार वालों के पसंदीदा पेशे थे -आईएफएस/आईएएस/आईपीएस, डॉक्टर, इंजीनियर, लेक्चरर, सीए, सीएस, एमबीए/बीबीए, बैंक पीओ/क्लर्क और सॉफ्टवेयर इंजीनियर। मैंने सैकड़ों लड़कियों के प्रोफाइल देखे। लेकिन किसी ने भी अपने पसंदीदा पेशे में जर्नलिज्म को शामिल नहीं किया था। अपने पेशे को फेवरिट न जानकर थोड़ा आश्चर्य हुआ। मुझे करीब 5 साल पहले का वह वाकया याद आ गया, जब मैंने घर में बताया था कि मैं पत्रकार बनना चाहता हूं। मेरे घर वालों को इस क्षेत्र में करियर नजर नहीं आ रहा था। हालांकि, उन्होंने इसका जोरदार विरोध नहीं किया। घर वालों ने इस पेशे के प्रति सिर्फ अपनी नापसंद जाहिर की थी। अब मैं उनकी मन:स्थिति समझ सकता था कि आखिर क्यों उन्हें यह पेशा पसंद नहीं था। आज भी लोग परंपरागत पेशों मसलन इंजीनियरिंग, मेडिकल और सरकारी नौकरी को शादी के लिए तरजीह देते हैं। पता नहीं जो लोग नौकरी नहीं करते उनसे शादी के लिए कौन तैयार होगा? साफ है कि समाज आज भी जर्नलिज्म को शादी योग्य पेशा नहीं मानता या कहा जा सकता है कि शादी के बाजार में यह पेशा बिकाऊ नहीं है।
बाजारवाद के युग में समाज में पैसा ही सबसे बड़ा मूल्य हो गया है। क्यों नहीं वैवाहिक विज्ञापनों में कहा जाता है कि हमें सच्चरित्र और ईमानदार पति चाहिए। आखिर विवाह जैसे संबंध में रूप और धन का ही इतना बोलबाला क्यों है?
Sunday, March 27, 2011
Friday, January 14, 2011
एक अज़ीज की याद में

किसी के बहुत करीब होना जितना सुखद है उसी अनुपात में दुखद भी। शायद यही वजह है कि ज्यादातर पति-पत्नी एक-दूसरे को झेलते हैं और स्वतंत्र खयाल रखने वालों की शादी ज्यादा दिन तक नहीं टिकती। सामान्य तौर पर लोग हर चीज को जीत और हार के रूप में देखने के आदी होते हैं। इस प्रवृत्ति से तल्खी बढ़ती है और कुदरती व्यवहारकुशलता कहीं खो जाती है। इसके असर से सब कुछ औपचारिकता में तब्दील हो जाता है। यानि व्यवहार में बनावटीपन आने लगता है।
कई मौकों पर हमारी गतिविधियां सामने वाले को केवल खुश करने के लिए होती है या फिर चिढ़ाने के लिए। मतलब यह कि स्वाभाविक व्यवहार की गुंजाइश धीरे-धीरे कम होती जा रही है। जो लोग स्वाभाविक व्यवहार वाले होते हैं, उन्हें सीधा (बेवकूफ) कहकर परोक्ष रूप से मजाक बनाने की कोशिश की जाती है।
मेरे एक पत्रकार मित्र की व्यवहारकुशलता और विनम्रता की बड़ी ख्याति है। लेकिन मैं और उसके कुछ अन्य करीबी मित्र उसकी खिल्ली उड़ाते हैं और वह झेंप जाता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि हमलोग उसकी कमियां जानते हैं और बाहरी दुनिया उसकी खूबियां जानती है। लेकिन यह भी सच है कि हम सब आपस में जितना मस्ती कर लेते हैं, उस तरह की मस्ती कहीं और संभव नहीं है।
- भीम सिंह
Friday, November 26, 2010
मनमोहन प्रभाव

विकास के मुद्दे पर बिहार के नीतीश कुमार प्रचंड बहुमत के साथ एक बार फिर सत्ता पर काबिज हो गए। मनमोहन सिंह भी भारतीय अर्थव्यवस्था को चमकाने का सपना दिखाकर दूसरी बार प्रधानमंत्री बने हैं। नीतीश कुमार की नीतियों का वास्तविक असर आने वाले समय में दिखेगा, लेकिन मनमोहन सिंह की नीतियों के प्रभाव धीरे-धीरे सामने आने लगे हैं। वर्ष 1991 में वे केंद्रीय वित्त मंत्री बने थे और तभी से उदारीकरण की नीति अपनाकर उन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खूब वाहवाही लूटी थी। उनकी दूसरी पारी तब शुरू हुई, जब वे तकरीबन 6 वर्ष पहले सोनिया गांधी की कृपा से प्रधानमंत्री बने। उनके मौजूदा कार्यकाल और पिछले कार्यकाल को भारत की तगड़ी आर्थित तरक्की के रूप में देखा जा रहा है। लेकिन अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं और संगठनों की ओर से जो रिपोर्ट जारी हो रही है, उनसे तो कम-से-कम यही लगता है कि उनके कार्यकाल में देश की अंदरुनी हालत बदतर हुई है।
वॉशिंगटन स्थित 'ग्लोबल फाइनेंशियल इंटिग्रिटी' की एक अध्ययन रिपोर्ट के मुताबिक आजादी के बाद कर की चोरी, अपराध और भ्रष्टïाचार के कारण भारत को कम-से-कम 450 अरब डॉलर का नुकसान हुआ है। हाल ही में उजागर हुए दूसरी पीढ़ी (2जी) का स्पेक्ट्रम घोटाला पौने लाख करोड़ रुपये का है। यह रकम उससे 10 गुनी है। रिपोर्ट कहती है कि इस घाटे के पीछे पूंजपति वर्ग और नीजि कंपनियों की बड़ी भूमिका रही है।
इस रिपोर्ट के मुताबिक कर से बचने, गलत तरीकों से की गई कमाई, पूंजी को गुप्त रखने की प्रवृत्ति, घूसखोरी, भ्रष्टïाचार और गैरकानूनी धंधे छुपाने की कोशिशों के चलते यह धन भारत से विदेश चला गया। तेजी से देश से बाहर जाते धन का सीधा ताल्लुक देश में अमीर और गरीबों के बीच बढ़ते फासले से है। अमीर के पास ज्यादा पूंजी है, जिसे वह विदेश में छुपा रहा है। इसलिए गरीबों के लिए चलाई जा रही योजनाओं में जरूतर से कम खर्च किया जा रहा है। यानि विकास और उन्नति के लिए काम कम किए जा रहे हैं।
यह रिपोर्ट कहती है कि वर्ष 1991 में भारतीय अर्थव्यवस्था के उदारीकरण के बाद यह घाटा बढ़ा है। इस तमाम घाटे का 68 फीसदी उदारीकरण के बाद ही हुआ। यानि निजी कंपनियों के लिए बाजार खोले जाने के बाद से पूंजीगत अपराधीकरण तेजी से बढ़ा है। जैसे-जैसे उदारीकरण की नीति आगे बढ़ती गई, देश से पैसा बाहर जाने की तीव्रता भी उसी गति से बढ़ी। मसलन, भारत से काला धन दूसरे देशों में जानी की गति पिछले 5 वर्षों में सबसे तेज रही।
दूसरी ओर दुनिया भर के अमीरों पर नजर रखने वाली पत्रिका 'फोब्र्स' के मुताबिक वर्ष 2009 में भारतीय अरबपतियों की संख्या दोगुनी हो गई। वर्ष 2008 में 24 भारतीय अबरपति थे, जिनकी संख्या वर्ष 2009 में 49 हो गई। इसके उलट ग्रामीण विकास मंत्रालय की ओर से राज्यसभा को दी गई जानकारी के मुताबिक वर्ष 2004-05 के दौरान भारत में गरीबी रेखा से नीचे गुजर-बसर करने वाली आबादी 30.17 करोड़ थी। जाहिर है, पिछले 5 वर्षों दौरान यह संख्या भी तेजी से बढ़ी है। मतलब यह कि देश में जिस गति से अरबपतियों की संख्या बढ़ रही है, उसी तीव्रता से गरीबी भी बढ़ रही है। ऐसे में यह सवाल उठना स्वभाविक है कि कथित रूप से आर्थिक महाशक्ति में तब्दील होते हमारे देश में गरीबी और अमीरी समान अनुपात में किस वजह से बढ़ रही है? इसी के साथ-साथ विदेशों में जाने वाले काले धन की मात्रा में भी दिनोंदिन इजाफा हो रहा है।
हाल ही में विश्व स्वस्थ्य संगठन ने भी एक रिपोर्ट जारी की है, जिसके निष्कर्ष चौंकाने वाले हैं। इस रिपोर्ट के मुताबिक बीमारियों के इलाज पर होने वाले भारी खर्च की वजह से सालाना 10 करोड़ लोग गरीब हो रहे हैं। भारत जैसे कुछ देशों में प्रत्येक वर्ष 5 फीसदी आबादी इसलिए गरीब हो जाती है क्योंकि उन्हें स्वास्थ्य सेवाओं पर जरूरत से ज्यादा खर्च करना पड़ता है। यह रिपोर्ट कहती है कि करोड़ों लोग बीमारियों से इसलिए मर रहे हैं क्योंकि उनके पास इलाज करवाने के लिए धन नहीं है। ऐसे लोगों की संख्या भी लाखों में है, जो इलाज शुरू तो कर लेते हैं, लेकिन इसे जारी रखने के लिए उनके पास पर्याप्त धन नहीं होता और अंतत: उनकी मौत हो जाती है।
इस रिपोर्ट में वर्ष 2007 में किए गए 'हार्वर्ड विश्वविद्यालय' के एक अध्ययन का हवाला दिया गया है, जिसके मुताबिक भारी-भरकम मेडिकल बिल की वजह से 62 फीसदी परिवार दीवालिया हो जाते हैं।
जाहिर है, मौजूदा विकास की नीति और पैमाना चिंताजनक रूप से दोषपूर्ण हैं। आंकड़े और तथ्य यह भी दर्शाते हैं कि मनमोहन सिंह की उदारीकरण एवं तेज विकास की नीति ने देश की अर्थव्यवस्था का बाहरी आवरण तो चमका दिया है, लेकिन इसके नतीजे गंभीर हैं। अरबपतियों की संख्या दिनोंदिन बढ़ते जाने, बाजार का विस्तार और कॉर्पोरेट जगत की मजबूत होती हुई स्थिति विकास के पैमाने कतई नहीं माने जा सकते क्योंकि इसी अर्थव्यवस्था के गवाह करोड़ों लोग दिनोंदिन गरीब होते जा रहे हैं, बीमारी के कारण मरने वाले लोगों की संख्या में इजाफा हो रहा है और भ्रष्टाचार एवं घोटालों के मामले तमाम सीमाएं लांघ चुके हैं।
विभिन्न रिपोर्ट एवं आंकड़ों से जाहिर होता है कि वर्ष 1991 में जब मौजूदा प्रधानमंत्री वित्त मंत्री बने थे और उन्होंने उदारीकरण की नीति अपनाते हुए देश की अर्थव्यवस्था को खुले बाजार की पटरी पर दौड़ाई थी, तभी से वित्तीय और पूंजीगत अपराधीकरण के साथ-साथ भ्रष्टाचार की प्रवृत्ति भी तेज हो गई। यह भी स्पष्टï है कि मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री बनने के बाद ये प्रवृत्तियां ज्यादा बेलगाम हुई हैं।
दरअसल, भारतीय अर्थव्यवस्था मिश्रित प्रणाली की है, जिसमें राज्य का कामकाज उन आधारभूत नीति से बहुत ज्यादा प्रभावित होता है, जिसके तहत निजी अर्थव्यवस्था संचालित होती है। मतलब यह कि सरकार के आर्थिक एवं अन्य फैसलों का सीधा असर जनता पर होता है। जाहिर है, मौजूदा हालात के लिए सीधे-सीधे हमारी सरकार जिम्मेदार है।
-भीम सिंह
Tuesday, September 14, 2010
कॉमनवेल्थ गेम्स की जान-दिल्ली
देश की राजधानी में होने वाले कॉमनवेल्थ गेम्स के सफल आयोजन को लेकर शायद ही किसी को शंका न हो। सबके पास इसको लेकर अलग-अलग विचार हैं। अधिकतर को गेम्स के सफल आयोजन को लेकर मन में खटका है। यदि हम ये मान लें कि ऐसी नकारात्मक सोच वाले मुट्ठी भर लोग ही हैं तो हम दुनिया में सबसे अधिक सकारात्मक सोच रखने वाले व्यçक्त होंगे। यदि गेम्स सफल हो जाते हैं (सफल तो होना ही है) तो ये उलझन रहेगी कि सफलता का श्रेय किसे दिया जाए? श्रेय लेने वाले की सूची में गेम्स की आयोजन समिति, केन्द्र और दिल्ली सरकार तथा इसका विरोध करने वाले कुछ लोगों के नाम भी शामिल होंगे।
गेम्स का विरोध करने वालों का नाम इसलिए कि उनके गेम्स के आयोजन विरोधी बयान से आयोजन समिति को नई ऊर्जा मिली। इससे समय पर गेम्स से सम्बंधित कामों को पूरा करने में फायदा हुआ होगा। समिति ने सफल आयोजन कर विरोधियों को करारा जवाब देने के लिए कमर कस ली होगी। इसलिए विरोधियों की भूमिका को नज़रअन्दाज नहीं किया जा सकता।
देश के प्रधानमन्त्री ने खेल के आयोजन स्थल का दौरा कर तैयारियों का जायजा लिया इसलिए यदि गेम्स सफल होते हैं तो केन्द्र सरकार को भी इसका श्रेय दिया जाना चाहिए। प्रधानमन्त्री का गेम्स से कोई सीधा सम्बंध तो नहीं है, फिर भी उन्होंने इसमें रुचि दिखाई, अपना कीमती वक्त निकाला और आयोजन स्थल का दौरा किया। इसके लिए कृतज्ञता तो प्रकट करनी ही चाहिए। भले ही वे अपने फील्ड में असफल रहे हों और उनका अर्थशास्त्र आम आदमी के काम न आया हो। इस पर ध्यान देने की जरूरत नहीं।
दिल्ली सरकार को इस बात का पूरा श्रेय मिलना चाहिए कि उसने गेम्स को सफल बनाने के लिए बहुत कुछ किया। बनागी देखिए, दिल्ली को खूबसूरत और आकर्षक बनाने के लिए कई जगहों पर गड्ढे खुदवा दिए। ताकि उसमें बारिश का पानी जमा हो जाए और डेंगू, मलेरिया तथा चिकनगुनिया जैसी बीमारियों के मच्छर उनमें बड़ी आसानी से पनप सकें। गेम्स के दौरान आनेवाले मेहमानों को आखिर सौगात में हम क्या देते। इससे ये समस्या भी हल हो गई। इस योजना से खुश होकर मच्छरों के सरदार ने भी दिल्ली सरकार को एक विशेष पुरस्कार देने के बारे में गम्भीरता से विचार कर रहा है।
गेम्स के आयोजन को सफल बनाने के लिए गीत भी लॉन्च किए गए। पहले सिर्फ एक गीत से काम चलाने की योजना थी, लेकिन गीत को लॉन्च करने के बाद लगा कि इसमें थोड़ी कमी रह गई है। इस कमी को पूरा करने के लिए दो और थीम सॉन्ग लॉन्च कर दिए गए। दूसरे थीम सॉन्ग में दिल्ली को जान बताया गया। इस तरह गीत से भी खेलों की तैयारियों में जान डालने की कोशिश की गई। प्रफेशनल सिंगर के साथ-साथ दिल्ली की मुखिया ने भी अपनी थरथराती आवाज में कुल लाइन गाया, ताकि गेम्स की तैयारियों को मजबूती मिल सके।
और अन्त में नंबर आता है आयोजन समिति के अध्यक्ष का, जिन्होंने बड़ी दिलेरी से हेरफेर के आरोपों और नाकामी की बद्दुआ का सामना किया। उन्होंने सभी आरोपों का न केवल जवाब दिया बल्कि जांच के लिए तैयार होने की बात भी कही। उनकी दिलेरी और गेम्स के सफल बनाने के जज्बे को सलाम करते हुए श्रेय देने की सूची में उनका नाम सबसे ऊपर आना चाहिए। इससे उनको हौसला मिलेगा और हमें ओलिंपिक जैसे बड़े खेलों की मेजबानी का मौका दिलाने में भी उनका अनुभव काम आ सकता है। यदि तब कोई बड़ा आरोप लगेगा तो उसे भी वे अपनी दिलेरी से सामना कर सकते हैं। क्योंकि हम धीरे-धीरे ही सही लेकिन आगे ओलिंपिक वाले ही रास्ते पर जा रहे हैं। एशियन और कॉमनवेल्थ के सफल आयोजन के बाद नंबर तो इसी का आएगा।
गेम्स का विरोध करने वालों का नाम इसलिए कि उनके गेम्स के आयोजन विरोधी बयान से आयोजन समिति को नई ऊर्जा मिली। इससे समय पर गेम्स से सम्बंधित कामों को पूरा करने में फायदा हुआ होगा। समिति ने सफल आयोजन कर विरोधियों को करारा जवाब देने के लिए कमर कस ली होगी। इसलिए विरोधियों की भूमिका को नज़रअन्दाज नहीं किया जा सकता।
देश के प्रधानमन्त्री ने खेल के आयोजन स्थल का दौरा कर तैयारियों का जायजा लिया इसलिए यदि गेम्स सफल होते हैं तो केन्द्र सरकार को भी इसका श्रेय दिया जाना चाहिए। प्रधानमन्त्री का गेम्स से कोई सीधा सम्बंध तो नहीं है, फिर भी उन्होंने इसमें रुचि दिखाई, अपना कीमती वक्त निकाला और आयोजन स्थल का दौरा किया। इसके लिए कृतज्ञता तो प्रकट करनी ही चाहिए। भले ही वे अपने फील्ड में असफल रहे हों और उनका अर्थशास्त्र आम आदमी के काम न आया हो। इस पर ध्यान देने की जरूरत नहीं।
दिल्ली सरकार को इस बात का पूरा श्रेय मिलना चाहिए कि उसने गेम्स को सफल बनाने के लिए बहुत कुछ किया। बनागी देखिए, दिल्ली को खूबसूरत और आकर्षक बनाने के लिए कई जगहों पर गड्ढे खुदवा दिए। ताकि उसमें बारिश का पानी जमा हो जाए और डेंगू, मलेरिया तथा चिकनगुनिया जैसी बीमारियों के मच्छर उनमें बड़ी आसानी से पनप सकें। गेम्स के दौरान आनेवाले मेहमानों को आखिर सौगात में हम क्या देते। इससे ये समस्या भी हल हो गई। इस योजना से खुश होकर मच्छरों के सरदार ने भी दिल्ली सरकार को एक विशेष पुरस्कार देने के बारे में गम्भीरता से विचार कर रहा है।
गेम्स के आयोजन को सफल बनाने के लिए गीत भी लॉन्च किए गए। पहले सिर्फ एक गीत से काम चलाने की योजना थी, लेकिन गीत को लॉन्च करने के बाद लगा कि इसमें थोड़ी कमी रह गई है। इस कमी को पूरा करने के लिए दो और थीम सॉन्ग लॉन्च कर दिए गए। दूसरे थीम सॉन्ग में दिल्ली को जान बताया गया। इस तरह गीत से भी खेलों की तैयारियों में जान डालने की कोशिश की गई। प्रफेशनल सिंगर के साथ-साथ दिल्ली की मुखिया ने भी अपनी थरथराती आवाज में कुल लाइन गाया, ताकि गेम्स की तैयारियों को मजबूती मिल सके।
और अन्त में नंबर आता है आयोजन समिति के अध्यक्ष का, जिन्होंने बड़ी दिलेरी से हेरफेर के आरोपों और नाकामी की बद्दुआ का सामना किया। उन्होंने सभी आरोपों का न केवल जवाब दिया बल्कि जांच के लिए तैयार होने की बात भी कही। उनकी दिलेरी और गेम्स के सफल बनाने के जज्बे को सलाम करते हुए श्रेय देने की सूची में उनका नाम सबसे ऊपर आना चाहिए। इससे उनको हौसला मिलेगा और हमें ओलिंपिक जैसे बड़े खेलों की मेजबानी का मौका दिलाने में भी उनका अनुभव काम आ सकता है। यदि तब कोई बड़ा आरोप लगेगा तो उसे भी वे अपनी दिलेरी से सामना कर सकते हैं। क्योंकि हम धीरे-धीरे ही सही लेकिन आगे ओलिंपिक वाले ही रास्ते पर जा रहे हैं। एशियन और कॉमनवेल्थ के सफल आयोजन के बाद नंबर तो इसी का आएगा।
Wednesday, July 14, 2010
अब ऑक्टोपस बाबा की चांदी
विश्वकप के समापन के साथ ही फुटबॉल और वुवुजेला का शोर थम गया लेकिन ज्योतिषाचार्य ऑक्टोपस जी महाराज की भविष्यवाणी की गूंज अब भी फिजाओं में बरकरार है। लोग भले ही 19वें फुटबॉल विश्वकप के घटनाक्रम को भूल जाएं लेकिन ऑक्टोपस जी महाराज वर्षो तक उनके जेहन में जरूर रहेंगे। ऑक्टोपस जी महाराज को नवीनतम ज्योतिषाचार्य की पदवी विश्वकप से ही तो मिली है! इनकी शत-प्रतिशत सफलता भाग्य में यकीन रखने वालों के लिए ऑक्सीजन से कम नहीं और ये सारे लोग जर्मनी की ओर कूच करने को बेताब हैं, ताकि कल के बारे में सही-सही जानकारी मिल सके!
गली के मोड़ पर चाय की दुकान चला रहे रामू को फिक्र है कि आने वाले दिनों में उसका बिजनेस कैसा रहेगा। उसे यह डर सता रहा है कि कहीं लोग चाय पीना बंद तो नहीं कर देंगे। रामू यह भी जानना चाहता है कि अब दूध के दाम कब बढ़ेंगे? चाय की कीमत और कितनी ऊपर जाएगी और चीनी रुकेगी भी या नहीं। हां, दाल की कीमतों से उसका कोई खास लेना-देना नहीं है।
पिछले हफ्ते कॉलेज में कदम रखने वाली हमारे पड़ोसी वर्मा जी की बेटी भी ज्योतिष ऑक्टोपस की सफलता से मंत्रमुग्ध है। वह ऑक्टोपस जी महाराज से जानना चाहती है कि कॉलेज में उसे कनखियों से देखना वाला लड़का कब तक उसके इशारे पर नाचने लगेगा। क्या उस क्यूट लड़के से उसका अफेयर सफल रहेगा? वह जानना चाहती है कि उसके मम्मी-पापा इससे नाराज तो नहीं होंगे या वह उन्हें शादी के लिए मनाने में कामयाब तो हो जाएगी?
शर्मा जी का बेटा ऑक्टोपस जी महाराज को अपने घर में लाकर रातों-रात करोड़पति बनने का ख्वाब देख रहा है! वह शर्मा जी को मनाने में लगा है कि एक बार उसे जर्मनी जाने की इजाजत दे दें। बस, वह करोड़पति बनने के सूत्र के साथ वापस लौट अएगा! सीधे-सादे शर्मा जी अपने बेटे के इस उत्साह को समझ नहीं पा रहे हैं। वह उससे कॉलेज की कट-ऑफ सूची देख आने की जिद कर रहे हैं!
मैं इन सबों को देख कर हैरत में हूं कि इससे जर्मनी को कितना फायदा होगा। बिना कुछ किए ही उसे कितने पर्यटक मिल रहे हैं! मंदी के बाद तो ऑक्टोपस जी महाराज ने उसके वारे-न्यारे करा दिए। एक हम हैं, जो करोड़ों रुपए खर्च कर और शहर में जगह-जगह गड्ढे खोद कर पर्यटकों को लुभाने के सूत्र पर चल रहे हैं। मुङो इस बात का अफसोस भी है कि हम अपने पुराने भविष्यवक्ता तोते की ब्रांडिंग को भुनाने में असफल रहे! चलिए कम से कम सबक तो मिला ही।
गली के मोड़ पर चाय की दुकान चला रहे रामू को फिक्र है कि आने वाले दिनों में उसका बिजनेस कैसा रहेगा। उसे यह डर सता रहा है कि कहीं लोग चाय पीना बंद तो नहीं कर देंगे। रामू यह भी जानना चाहता है कि अब दूध के दाम कब बढ़ेंगे? चाय की कीमत और कितनी ऊपर जाएगी और चीनी रुकेगी भी या नहीं। हां, दाल की कीमतों से उसका कोई खास लेना-देना नहीं है।
पिछले हफ्ते कॉलेज में कदम रखने वाली हमारे पड़ोसी वर्मा जी की बेटी भी ज्योतिष ऑक्टोपस की सफलता से मंत्रमुग्ध है। वह ऑक्टोपस जी महाराज से जानना चाहती है कि कॉलेज में उसे कनखियों से देखना वाला लड़का कब तक उसके इशारे पर नाचने लगेगा। क्या उस क्यूट लड़के से उसका अफेयर सफल रहेगा? वह जानना चाहती है कि उसके मम्मी-पापा इससे नाराज तो नहीं होंगे या वह उन्हें शादी के लिए मनाने में कामयाब तो हो जाएगी?
शर्मा जी का बेटा ऑक्टोपस जी महाराज को अपने घर में लाकर रातों-रात करोड़पति बनने का ख्वाब देख रहा है! वह शर्मा जी को मनाने में लगा है कि एक बार उसे जर्मनी जाने की इजाजत दे दें। बस, वह करोड़पति बनने के सूत्र के साथ वापस लौट अएगा! सीधे-सादे शर्मा जी अपने बेटे के इस उत्साह को समझ नहीं पा रहे हैं। वह उससे कॉलेज की कट-ऑफ सूची देख आने की जिद कर रहे हैं!
मैं इन सबों को देख कर हैरत में हूं कि इससे जर्मनी को कितना फायदा होगा। बिना कुछ किए ही उसे कितने पर्यटक मिल रहे हैं! मंदी के बाद तो ऑक्टोपस जी महाराज ने उसके वारे-न्यारे करा दिए। एक हम हैं, जो करोड़ों रुपए खर्च कर और शहर में जगह-जगह गड्ढे खोद कर पर्यटकों को लुभाने के सूत्र पर चल रहे हैं। मुङो इस बात का अफसोस भी है कि हम अपने पुराने भविष्यवक्ता तोते की ब्रांडिंग को भुनाने में असफल रहे! चलिए कम से कम सबक तो मिला ही।
Wednesday, July 7, 2010
फुटबॉल एक जादुई खेल!

वाकई फुटबॉल एक जादुई खेल है, जिसके सम्मोहन में अधिकांश खेल प्रेमी बंध गए हैं। अपना देश फुटबॉल वर्ल्ड कप में हिस्सा नहीं ले रहा है बावजूद इसके फुटबॉल का जादू खेल प्रेमियों के सिर चढ़ कर बोल रहा है। खेल प्रेमियों से लेकर खेल की खबर पहुंचाने वाले तक इसकी खुमारी से बच नहीं पाए हैं।
फुटबॉल का सम्मोहन वलर्ड कप के आयोजन के दिन से ही है। लीग मैचों में हिस्सा लेने वाले कई छोटे-छोटे देशों को खेल प्रेमी जानते भी नहीं थे। लेकिन अपनी चहेती टीम और खिलाड़ियों को समर्थन करने वाले खेल प्रेमी पौ फटने तक सूजी हुई आंखों के साथ टीवी से चिपके रहे। फुटबॉल का सम्मोहन इतना मजबूत है कि भारत द्वारा 15 साल बाद क्रिकेट का एशिया कप जीतने की खबर अखबार के खेल के पन्ने के एक कोने में सिमट कर रह गई। इससे साफ जाहिर है कि फुटबॉल का नशा चारों ओर है। इसके आगे क्रिकेट और टेनिस सब की चमक फीकी है। अपने देश के पूर्व क्रिकेटर (सौरभ गांगुली) भी क्रिकेट की बजाए फुटबॉल वर्ल्ड कप की संभावनाओं पर कलम चला रहे हैं। इस दौरान इंग्लैंड में विम्बलडन चल रहा है लेकिन फुटबॉल और वुवुजेला के आगे रोजर फेडरर और राफेल नडाल सहित टेनिस की सुंदरियों का जादू भी नहीं चल पाया।
एक मजेदार बात यह भी है कि फुटबॉल वर्ल्ड कप के दौरान ही दूसरे खेलों में कई महत्वपूर्ण परिणाम सामने आए। उदाहरण के लिए क्रिकेट के एशिया कप को ही ले लिया जाए या साइना नेहवाल का इंडोनेशिया सुपर सीरीज जीतना। नेहवाल का यह लगातार तीसरा खिताब था तो भारतीय क्रिकेट टीम ने डेढ़ दशक बाद एशिया कप जीता। क्रिकेट के दीवाने अपने देश में फुटबॉल का जुनून देखकर सिर्फ अचरज ही किया जा सकता है!
हालांकि फुटबॉल का असली जादू तो प्री-क्वार्टर फाइनल से शुरू हुआ। क्वार्टर फाइनल में फाइनल जीतने की दावेदार दो मजबूत टीम-ब्राजील और अर्जेटीना बाहर हो गईं। ब्राजील को हॉलैंड ने हराया जबकि जर्मनी ने अर्जेटीना को बाहर का रास्ता दिखा दिया। इसके बाद खेले गए पहले सेमीफाइनल में हॉलैंड ने उरुग्वे को हराकर फाइनल में प्रवेश किया। फाइनल में पहुंचने वाली दूसरी टीम का फैसला आज देर रात खेले जाने वाले जर्मनी और स्पेन के मैच से होगा।
फाइनल में चाहे जिन दो देशों के बीच मुकाबलो हो फुटबॉल वर्ल्ड कप के कई आश्चर्यजनक परिणामों को देखते हुए फुटबॉल को चमत्कारी और जादुई खेल कहा जाए तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। बस, अब इस चमत्कारी खेल के समापन में कुछ रोज ही बचे हैं। जमकर मजा लीजिए इस खेल का!
Friday, July 2, 2010
बड़ा उलटफेर- ब्राज़ील बाहर
विश्व कप फुटबॉल में इस बार के सबसे बड़े उलटफेर में कप की प्रमुख दावेदार और पांच बार की विश्व विजेता टीम ब्राजील क्वार्टर फाइनल में नीदरलैंड से 2-1 से हारकर प्रतियोगिता से बाहर हो गई। ब्राजील को जसे खुद इस परिणाम पर यकीन नहीं था। उसे फीफा ने पहली वरीयता की टीम घोषित किया था।
ब्राजील की पराजय से दक्षिण अफ्रीका में चल रही प्रतियोगिता की चमक कुछ फीकी पड़ गई क्योंकि पहले विश्व कप से अब तक विश्व स्तर पर फुटबॉल का इतिहास दरअसल ब्राजील का इतिहास रहा है। ब्राजील ने 1958, 62, 70, 94 और 2002 का कप जीता था और 1950 व 1998 में वह उप विजेता रहा।
शनिवार को ब्राजील ने मुकाबले की शुरुआत धमाकेदार ढंग से की और 10वें मिनट में रोबिन्हो ने गोल कर टीम को 1-0 की बढ़त दिला दी। इसके पहले एक गोल और हो सकता था लेकिन रोबिन्हो के इस गोल को ऑफ साइड होने की वजह से नकार दिया गया। आधे समय तक ब्राजील की बढ़त कायम रही लेकिन उत्तरार्ध लगभग पूरी तरह नीदरलैंड का रहा, जिसकी शुरुआत ब्राजील की अपनी गलती से हुई। 53वें मिनट में ब्राजील के फेलिप मेलो का एक हेडर सीधा गोल में चला गया और इस आत्मघाती गोल ने स्कोर बराबर कर दिया।
ब्राजील की पराजय से दक्षिण अफ्रीका में चल रही प्रतियोगिता की चमक कुछ फीकी पड़ गई क्योंकि पहले विश्व कप से अब तक विश्व स्तर पर फुटबॉल का इतिहास दरअसल ब्राजील का इतिहास रहा है। ब्राजील ने 1958, 62, 70, 94 और 2002 का कप जीता था और 1950 व 1998 में वह उप विजेता रहा।
शनिवार को ब्राजील ने मुकाबले की शुरुआत धमाकेदार ढंग से की और 10वें मिनट में रोबिन्हो ने गोल कर टीम को 1-0 की बढ़त दिला दी। इसके पहले एक गोल और हो सकता था लेकिन रोबिन्हो के इस गोल को ऑफ साइड होने की वजह से नकार दिया गया। आधे समय तक ब्राजील की बढ़त कायम रही लेकिन उत्तरार्ध लगभग पूरी तरह नीदरलैंड का रहा, जिसकी शुरुआत ब्राजील की अपनी गलती से हुई। 53वें मिनट में ब्राजील के फेलिप मेलो का एक हेडर सीधा गोल में चला गया और इस आत्मघाती गोल ने स्कोर बराबर कर दिया।
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