Thursday, January 21, 2010

आखिरी गाने का रहस्य!

मेरे एक मित्र को रात में बिना लोरी सुने नींद नहीं आती। यह आदत उन्हें बचपन से लगी थी। तब उनकी मां उन्हें प्यार से पीट-पीटकर, कुछ गुनगुनाकर सुलाया करती थीं। यह बात मेरे मित्र ने स्वयं मुङो बताई थी। इससे यह अनुमान बिल्कुल नहीं लगाया जाना चाहिए कि मेरी मित्रता लता मंगेशकर के नाती-पोते से है। लेकिन शहर में भला ये काम कौन करता? गर्लफ्रेंड बनाना उन्हें आया नहीं। इसका हल उन्होंने एफएम के रूप में ढूंढ़ लिया। रोज रात को वह बिस्तर पर एफएम के साथ खोये-खोये मिलते। उनकी आंखें अब एफएम के इशारे पर बंद होती हैं और उसी के इशारे पर खुलती भी।

रोज की भांति मेरे मित्र कान में गोला ठूंसकर (ईयरफोन) बिस्तर पर निढाल पड़ गए। एक के बाद एक गाने बजते जा रहे हैं। आरजे बीच-बीच में अपना प्रवचन भी सुना रहा है। प्यार क्या है? प्यार क्यों होता है? और न जाने क्या-क्या? जसे प्यार पर उसने अनगिनत शोध कर प्यार का पेटेंट हासिल कर लिया हो! मेरे मित्र को नींद की आगोश में जाते-जाते जो आखिरी गीत सुनाई पड़ा, वह था-रात कली एक ख्वाब में आई/और गले का हार हुई.. सुबह को जब हम नींद से जागे/आंख उन्हीं से चार हुई..। पहली दो लाइन हमेशा सही साबित होती रही हैं लेकिन बाकी के सच होने का इंतजार था! दो लाइन ही अब तक सुकून देने और रात को रंगीन, हसीन एवं सतरंगी बनाने के लिए काफी थे!

सुबह आंख खुली। रात के आखिरी गाने की रूमानियत दिल और दिमाग पर अब भी मद्धम-मद्धम छायी हुई है। अचानक उनका मोबाइल बजता है। दूसरी तरफ से आवाज आती है-मैं फलां मोबाइल कंपनी से मिस एक्स बोल रही हूं। मित्र रूमानियत से बाहर नहीं निकलना चाहते थे। उन्होंने कह दिया कि अभी बहुत व्यस्त हूं। बाद में फोन कीजिएगा! 'मिस एक्स' को अच्छा नहीं लगा। उसने जोर डाला कि एक बार पूरी बात तो सुन लें! लेकिन मित्र टस से मस नहीं हुए। थोड़ी देर बाद फिर फोन आया। मित्र को नंबर जाना पहचाना लगा। इस बार थोड़ी उदारता दिखाते हुए उन्होंने 'मिस एक्स' की पूरी बात सुनी। 'मिस एक्स' नया कनेक्शन लेने के लिए राजी करने को आतुर थीं!

'मिस एक्स' बातों ही बातों में ब्रांड एंबेसडर बन गईं। मित्र ने झल्लाहट छुपाते हुए कहा- आपकी कंपनी को कस्टमर नहीं मिल रहे क्या? 'मिस एक्स' का जवाब सिर्फ हंसी थी। मित्र ने इस बार सोचने का वक्त मांगकर पीछा छुड़ाया। फोन कट गया। मित्र के कुछ सोचने से पहले फिर 'मिस एक्स' का फोन आ गया! इस बार 'मिस एक्स' की दिलचस्पी कंपनी के काम की बजाय मेरे मित्र के नाम जानने में थी। मित्र हैरत में थे! उन्हें पहली बार आखिरी गाने की आखिरी लाइन का रहस्य पता चला!

Friday, January 8, 2010

अखबारवालों की जल्दबाजी

क्रिकेट अनिश्चतताओं का खेल है। यह बात समय-समय पर स्वयं क्रिकेट ही सिद्ध करता रहा है। इसका सबसे ताजा उदाहरण सिडनी क्रिकेट ग्राउंड पर आस्ट्रेलिया और पाकिस्तान के बीच खेला गया दूसरा क्रिकेट टेस्ट मैच था। तीन टेस्ट मैचों की सीरीज का पहला टेस्ट जीतकर आस्ट्रेलिया बुलंद हौसले के साथ सिडनी के स्पिनरों को मदद करने वाली पिच पर उतरा था। लेकिन आस्ट्रेलिया की पूरी टीम पहली पारी में महज 127 रन बनाकर आउट हो गई। इसके जवाब में पाकिस्तान ने 333 रन बनाकर बढ़त हासिल कर ली। अपनी दूसरी पारी में आस्ट्रेलियाई टीम ने मैच के तीसरे दिन खेल खत्म होने तक आठ विकेट के नुकसान पर 286 रन बनाए, जिससे उसे 80 रन की बढ़त हासिल हो चुकी थी और उसके पास दो विकेट शेष थे। आस्ट्रेलिया के धाकड़ बल्लेबाज माइक हसी 73 रन बनाकर क्रीज पर मौजूद थे।

मैच के चौथे दिन क्या होगा ये किसी को पता नहीं था। लेकिन यहां पाकिस्तान का पलड़ा पूरी तरह भारी था, इसमें भी कोई संदेह नहीं। छह जनवरी की सुबह जितने हिंदी और अंग्रेजी के अखबारों पर नजर डाली सभी ने लगभग एक-सा शीर्षक लगाया -पाकिस्तान जीत के करीब। यहीं अखबारों से भूल हो गई। अखबार के खेल के पन्ने से जुड़े पत्रकार बंधु पाकिस्तान को जिताने के लिए इतने उतावले क्यों थे मुङो समझ नहीं आया। अगर पाकिस्तान मैच के चौथे दिन जीत हासिल करने में कामयाब हो जाता तो अखबारों के इस शीर्षक की सार्थकता सिद्ध हो जाती। यदि अखबार वाले कम से कम एक सुबह और इंतजार कर लेते तो कुछ नहीं बिगड़ जाता। पता नहीं क्यों वे समाचार चैनलों से होड़ लगाने लगे।

दूसरे टेस्ट के चौथे आस्ट्रेलिया की पारी 381 रनों पर जाकर रुकी। तीसरे दिन के नाबाद बल्लेबाज हसी ने शानदार शतक जड़ा और उन्होंने 134 रन बनाए और अंत तक आउट नहीं हुए। इस तरह आस्ट्रेलिया ने अपनी दूसरी पारी के आधार पर कुल 175 रनों की बढ़त हासिल कर ली। पाकिस्तान को दूसरे टेस्ट में जीत के लिए 176 रन का लक्ष्य मिला। लेकिन उसकी पूरी टीम 139 रन बनाकर आउट हो गई और अखबारों के शीर्षक के उलट आस्ट्रेलिया ने दूसरा टेस्ट मैच 36 रन से जीत लिया।

यदि अखबारवालों ने थोड़ा धैर्य रखा होता तो मुङो यह पोस्ट नहीं लिखना पड़ता!

Sunday, January 3, 2010

थप्पड़ का कमाल!

थप्पड़ खाना शायद ही किसी को पसंद हो। लेकिन बिना थप्पड़ खाए हमारे अक्ल पर ताला पड़ा रहता है। यह ताला सिर्फ थप्पड़ नाम की चाभी से ही खुलता है। एक अदद थप्पड़ ने न जाने कितने लोगों की दुनिया बदल दी। हमारे आसपास कई उदाहरण मिल जाएंगे, जिन्होंने थप्पड़ खाने के बाद सफलता का स्वाद चखा। थप्पड़ खाने से पहले तक उन्हें सफलता के स्वाद के बारे में पता तक न था। एक 'कड़वे' थप्पड़ ने बहुतों को सफलता का 'मीठा' स्वाद बता दिया!

अपने क्रिकेटर श्रीसंत का मामला सबसे ताजा है। क्रिकेट की अपनी पहली पारी में वे कुछ खास नहीं कर सके थे। वे अपनी गेंदबाजी से ज्यादा मैदान पर ब्रेक डांस के लिए जाने जाते थे। उन्हें कोई विकेट हाथ लगा या अंत में कोई बड़ा शॉट लगा दिया तो लगे पिच पर ब्रेक डांस करने। लेकिन आईपीएल में एक मैच के दौरान भज्जी का थप्पड़ क्या लगा उनके रात और दिन बदल गए। अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट की दूसरी पारी में वे सिर्फ अपनी गेंदबाजी के लिए ही चर्चा में रहे। श्रीलंका के खिलाफ घरेलू टेस्ट श्रंखला में वे मारक साबित हुए। भज्जी के थप्पड़ ने कमाल कर दिया!

थप्पड़ की, 'बादशाह' खान की दुनिया बदलने में भी बड़ी अहम भूमिका रही है। बचपन में शाहरुख को किसी क्रिकेटर ने थप्पड़ जड़ दिया था। किंग खान की गलती सिर्फ इतनी थी कि वे क्रिकेटर के आउट होकर पैवेलियन लौटते समय ऑटोग्राफ मांग रहे थे। क्रिकेटर द्वारा ऑटोग्राफ के बदले दिए गए थप्पड़ का असर इतना बड़ा था कि करीब दो दशक बाद शाहरुख ने कई क्रिकेटरों को खरीद लिया! अब तो उनके पास देशी-विदेशी क्रिकेटरों की एक बेहतरीन फौज तैयार है। यदि शाहरुख को थप्पड़ न पड़ा होता तो शायद वे ऐसा करने के बारे में सोचते भी न! हालांकि उनकी टीम अब तक आईपीएल में कुछ कारनामा नहीं कर सकी है लेकिन अपनी टीम को लेकर शाहरुख आज हुंकार तो भरते हैं! ये क्या कम है!

थप्पड़ मजनू टाइप प्रेमियों के लिए 'प्रेम' होने का संकेत भी देता है। अगर प्यार में पिटे नहीं तो आखिर वह कैसा प्रेम! पिटाई के बाद ही प्रेम पुख्ता होता है। प्रेमिका के भाई या उसके पुराने प्रेमी से पिटना अद्भुत घटना है। ऐसा होना मतलब प्रेमी को मन की मुराद मिल जाना है। जब ऐसा हो समझिए आप प्रेमिका के दिल में पहले से ज्यादा जगह घेरने में कामयाब हो गए हैं!

मुङो थप्पड़ न मिलने का आज तक अफसोस है! किसी ने इस काबिल ही नहीं समझा! अब तो थप्पड़ की हसरत लिए ही इस जहां से कूच करना होगा क्योंकि इस उम्र में थप्पड़ का दर्द ङोल नहीं पाऊंगा! नाकामयाब होने का दर्द ही काफी है!